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घंटी, ताली, शंख बजाने की वैज्ञानिकता और इसके फायदे | Corona Virus

आज आप अपने घरों में से ही ताली बजाकर, थाली बजाकर, घंटी बजाकर एक-दूसरे का आभार जताएं और इस वायरस से लड़ने के लिए एकजुटता दिखाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देशवासियों से की गई इस अपील को हल्के में कतई न लें। उन्होंने जो कहा और समझाया, उसके मायने सभी को समझ में आए। लेकिन एक बात, जो उन्होंने नहीं समझाई, वह हमने भारतीय संस्कृति और विज्ञान के जानकारों से समझी।

आपको बताते है कि सनातन धर्म-संस्कृति में करतल ध्वनि, घंटा ध्वनि, शंख ध्वनि का अपना महत्व है। मंदिर हों या घर, इन ध्वनियों का पूजा पद्धति में विशेष स्थान है। आयुर्वेद में इनके चिकित्सकीय महत्व का वर्णन है। आचार्य प्रो. बी एन द्विवेदी, भौतिकी विभाग, आइआइटी-बीएचयू ने बताया, घंटियां इस तरह से बनाई जाती हैं कि जब वे ध्वनि उत्पन्न करती हैं तो यह हमारे दिमाग के बाएं और दाएं हिस्से में एक एकता पैदा करती हैं। जिस क्षण हम घंटा-घंटी बजाते हैं, यह एक तेज और स्थायी ध्वनि उत्पन्न करते हें, जो प्रतिध्वनि मोड में न्यूनतम 7 सेकंड तक रहता है।

मनुष्य के शरीर के सभी सात उपचार केंद्रों को सक्रिय करने के लिए प्रतिध्वनि की अवधि काफी अच्छी है। जब घंटा-घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है। इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं, जिससे आसपास का वातावरण शुद्ध हो जाता है। शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। घंटी को वामभाग में रखना चाहिए और बाएं हाथ से नेत्रों तक ऊंचा उठाकर बजाना चाहिए।

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. केएन उत्तम, भौतिकी विभाग ने समझाया, मंत्र चिकित्सा में ध्वनि के अनुनाद विज्ञान का वृहद उपयोग है। अनुनाद की परिभाषा है कि जब किन्हीं दो वस्तुओं की आवृत्ति समान हो जाती है तो अनुनाद की स्थिति उत्पन्न होती है। अनुनाद के समय मानव शरीर में अधिक ऊर्जा का संचार होता है। इससे बाहरी विषाणुओं और रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है।

इनको बजाने के महत्व – घंटा-घंटी, थाली-चम्मच इत्यादि से ध्वनि उत्पन्न करने से निश्चित आवृत्ति की ध्वनि निकलती है। यह विभिन्न शरीर के लोगों के बराबर हो सकती है। ऐसे में शरीर में किसी रोग और विषाणुओं से लड़ने की क्षमता पैदा हो जाती है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर सीवी रमन ने शोध के प्रारंभिक क्षणों में ध्वनि के अनुनाद विज्ञान पर काफी शोध कार्य किया है।

हरिद्वार के महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतनानंद, परमाध्यक्ष हरिसेवा आश्रम ने कहा, यह सत्य है। ताली भी बजाओ, थाली भी बजाओ। आयुर्वेद के साथ-साथ पुराणों में भी इसका वर्णन है। अमंगल को दूर करने के लिए तुलसी ने भी रामचरितमानस में इसका वर्णन किया गया है। जब हम पांच और पांच उंगली मिलाकर करतल ध्वनि करते हैं तो इससे संशय रूपी विहंग उड़ जाते हैं।

वास्तुशास्त्री वैज्ञानिक संजीव जी कहते हैं कि कोरोना की समस्याओं के संदर्भ में भी ध्वनि विज्ञान का विशेष प्रयोग महत्वपूर्ण है। इन ध्वनियों को धर्म के माध्यम से हमारी दिनचर्या में सम्मिलित इसी उद्देश्य से किया गया। पारंपरिक पूजा पद्धति में शंख, कांस्य, घंट इत्यादि की ध्वनि का आयुर्वेद के अलावा शिवपुराण में भी विशेष महत्व बताया गया है। वहीं, जगदगुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती समझाते हैं, घंटे की मंगलध्वनि से दूर होती है नकारात्मक शक्तियां सनातन धर्म की सभी परंपराएं वैज्ञानिक और वैदिक, दोनों दृष्टि से लाभकारी हैं।

यदि घंटा ध्वनि, शंख ध्वनि, झांझ, मजीरा, क्षुद्रघंट आदि जो बजाते हैं और जो इसकी मंगल ध्वनि सुनते हैं उनके जीवन से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। कोरोना वायरस पर नियंत्रण के लिहाज से पीएम की ओर से जनता कफ्र्यू के आह्वान ने घंटा-घंटी का बाजार बढ़ा दिया। वाराणसी की बात करें तो रविवार की शाम लोगों ने इनकी खूब खरीदारी की। इससे दशाश्वमेध व ठठेरी बाजार में सामान्य दिनों की अपेक्षा 25 फीसद तक अधिक लोग आए। इसमें शंख, घंटा-घंटी आदि की अधिक बिक्री हुई।

पीएम मोदी ने घंटा, ताली, शंख बजाकर आभार जताने को ही क्‍यों कहा ? जानें वैज्ञानिकता और फायदे

हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस संकट के बीच लोगों से अपील की है कि घर-घर दूध, अखबार, राशन पहुंचाने वालों, पुलिसकर्मी, स्‍वास्‍थ्‍य कर्मी और पत्रकारों का आभार जताने के लिए आज शाम को 5 बजे शंख, ताली, घंटा-थाली बजाएं. हमने कुछ डॉक्‍टरों, योग और आयुर्वेद के जानकारों से इस तरह आभार जताने के पीछे की वैज्ञानिकता और फायदे जानने की कोशिश की।

आप यह भलीभांति जानते है कि चीन के वुहान में तबाही मचाने के बाद सीमाओं को लांघकर बाहर निकले कोरोना वायरस Coronavirus ने पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया है. अब तक दुनिया भर में 277,056 लोग इस वैश्विक महामारी से संक्रमित हो चुके हैं. इनमें 11,424 लोगों की गंभीर संक्रमण के कारण मौत हो चुकी है. वहीं 91,986 लोग संक्रमण से उबरने के बाद स्‍वस्‍थ होकर घर लौट चुके हैं. ये वायरस भारत में भी हर दिन पैर पसार रहा है। भारत में अब तक लगभग 300 से ज्यादा लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई है। इनमें 5 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें भी एक की मौत स्‍वस्‍थ होने के तीन बाद हुई।

आज घर की बालकनी या गेट पर आकर शंख, ताली, घंटा-थाली बजाएं। हमने कुछ डॉक्‍टरों, योग और आयुर्वेद के जानकारों से इस तरह आभार जताने के पीछे की वैज्ञानिकता और फायदे जानने की कोशिश की। आइए जानते है All Ayurvedic के माध्यम से इसके बारे में।

कैसे ताली बजाने के दौरान प्रेशर प्‍वाइंट्स दबने से लंग्‍स को होता है फायदा?

इंडियन योगा एसोसिएशन और इंटरनेशनल नेचुरोपैथी ऑर्गेनाइजेशन की मेंबर डॉ. चारू शर्मा का कहना है कि हमारे हाथों में एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स अधिक होते हैं. ताली बजाने के दौरान हथेलियों के एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स पर अच्छा दबाव पड़ता है, जिससे हृदय और फेफड़ों की बीमारियां में फायदा पहुंचता है. हमारे शरीर के 30 से ज्‍यादा एक्यूप्रेशर पॉइंटस हथेलियों में ही होते हैं. प्रेशर पॉइंट को दबाने से उससे कनेक्‍टेड अंग तक रक्त और ऑक्सीजन का संचार अच्छे से होने लगता है. इन सभी दबाव बिंदु को सही तरीके से दबाने का सबसे आसान तरीका ताली बजाना ही है।

ताली बजाने से नर्वस सिस्‍टम पर होता है इफेक्‍ट, इम्‍युनिटी में होगा इजाफा

डॉ. शर्मा के मुताबिक, हथेली पर दबाव तभी अच्छा माना जाता है जब ताली बजाते-बजाते हथेलियां लाल हो जाएं और शरीर से पसीना आने लगे. ताली बजाने से हमारे नर्वस सिस्‍टम पर असर पडता है और इम्‍युनिटी बेहतर होती है. वहीं, घंटा-घंटी, थाली बजाने से मंत्र के उच्‍चारण जैसा प्रभाव होता है. ये भी हमारे नर्वस सिस्‍टम को अच्‍छा महसूस कराकर रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है. वहीं, शंख बजाने से हमारे रिसेपिरेटरी सिस्‍टम की एक्‍सरसाइज होती है. ये सभी चीजें कोरोना वायरस से मुकाबले में मददगार साबित हो सकती हैं।

क्या है घंटा और थाली बजाने के साथ “ॐ” उच्चारण के वैज्ञानिक फायदे

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के आयुर्वेद विभाग के हेड प्रोफेसर चंद्रभूषण यामिनी ने बताया कि घंटा और थाली बजाने से शरीर को होने वाले फायदों के वैज्ञानिक प्रमाण तो मौजूद नहीं हैं, लेकिन ऐतिहासिक प्रमाण हैं. हालांकि, इसका फायदा लेने के लिए जरूरी है कि हर व्‍यक्ति एक ही समय पर एक ही आकार के घंटे और थाली बजाए, जो संभव नहीं है. उन्‍होंने कहा कि ऊं के उच्‍चारण से मानव शरीर को होने वाले फायदों को विज्ञान भी स्‍वीकार कर चुका है. हालांकि, इसमें भी समूह में उच्‍चारण करने पर सभी का आरोह-अवरोह यानी एक जैसा उच्‍चारण होना चाहिए।

कैसे शंख बजाने से श्‍वसन तंत्र और फेफड़ों को मिलता है काफी फायदा?

आयुर्वेदाचार्य डॉ. लक्ष्‍मीकांत त्रिपाठी ने बताया कि आयुर्वेद में ताली, घंटी, घंटा बजाने के महत्व की जानकारी दी गई है. शंख की ध्वनि से हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले वायुमंडल में फैले अति सूक्ष्म किटाणु नष्ट हो जाते हैं,. वहीं, इससे सांस की बीमारियों में भी फायदा मिलता है. शंख बजाने से योग में बताए गए पूरक, कुंभक और प्राणायाम एक साथ हो जाते हैं. उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया कि पूरक सांस लेने, कुंभक सांस रोकने और रेचक सांस छोडऩे की प्रक्रिया है. वह कहते हैं कि कोरोना वायरस हमारे श्‍वसन तंत्र को ही नुकसान पहुंचा रहा है. ऐसे में शंख बजाने से आप संक्रमण से मुकाबले के लिए तैयारी कर लेते हैं।

हमारे आयुर्वेद के मुताबिक अगर आपको खांसी, दमा, ब्लड प्रेशर की शिकायत है तो शंख बजाकर कुछ हद तक इससे छुटकरा पाया जा सकता है. वहीं, शंख में प्राकृतिक कैल्शियम और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है. रोज शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं हो सकते. शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र और फेफड़ों का व्यायाम भी हो जाता है. इससे आप वायरस से बच जाएंगे इसकी तो कोई गारंटी नहीं है, लेकिन मुकाबले के लिए तैयार हो सकते हैं।

आस्था का विज्ञान

हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥

भद्रकाली की उपासना का एक मंत्र जिसका अर्थ है- हे देवी! जो अपनी ध्वनि से संपूर्ण जगत को व्याप्त करदैत्यों के तेज को नष्ट किए देता है, वह तुम्हारा घण्टा हम सभी की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है।

दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥

भद्रकाली की उपासना का एक मंत्र जिसका अर्थ है- हे देवी! जो अपनी ध्वनि से संपूर्ण जगत को व्याप्त करदैत्यों के तेज को नष्ट किए देता है, वह तुम्हारा घण्टा हम सभी की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है।

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