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महाशिवरात्रि क्यो मनाई जाती है, इसके वृत का वैज्ञानिक महत्व

महाशिवरात्रि की पूजा करने की विधि, मंत्र और शुभ मुहूर्त :

महाशिवरात्रि पर शहर के शिवालयों पर धूम मचेगी। सुबह की महाआरती के बाद मंदिरों के पट भक्तों के लिए खुल गए हैं। महाशिवरात्रि को भगवान शंकर की आराधना, उपासना और उनका ध्यान करने उनकी विशेष कृपा पाई जा सकती है। 21 तारीख को शाम को 5 बजकर 20 मिनट से 22 फरवरी, शनिवार को शाम सात बजकर 2 मिनट तक रहेगी।

महाशिवरात्रि को भगवान शंकर की आराधना, उपासना और उनका ध्यान करने उनकी विशेष कृपा पाई जा सकती है। 21 तारीख को शाम को 5 बजकर 20 मिनट से 22 फरवरी, शनिवार को शाम सात बजकर 2 मिनट तक रहेगी।

रात्रि प्रहर पूजा मुहू्र्त

शाम को 6 बजकर 41 मिनट से रात 12 बजकर 52 मिनट तक होगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त

निशिथ काल पूजा- रात 12 बजकर 28 मिनट से 1 बजकर 18 मिनट तक (22 फरवरी 2020)

पारण का समय- सुबह 6 बजकर 57 मिनट से दोपहर 3 बजकर 23 मिनट तक (22 फरवरी)

चतुर्दशी तिथि आरंभ- सुबह 5 बजकर 20 मिनट से (21 फरवरी 2020)

चतुर्दशी तिथि समाप्त- अगले दिन 7 बजकर 2 मिनट तक (22 फरवरी 2020)

117 साल बाद दुर्लभ योगों में 21 फरवरी को मनाई जाएगी महाशिवरात्रि, शनि स्वराशि में और शुक्र उच्च राशि में रहेगा

महाशिवरात्रि पर 28 साल बाद बनेगा विष योग

21 फरवरी को बुधादित्य और शुक्रवार, 21 फरवरी को महाशिवरात्रि है। हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर शिव पूजा का महापर्व शिवरात्रि मनाया जाता है। जब सूर्य कुंभ राशि और चंद्र मकर राशि में होता है, तब फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की रात ये पर्व मनाया जाता है।

21 फरवरी की शाम 5.36 बजे तक त्रयोदशी तिथि रहेगी, उसके बाद चतुर्दशी तिथि शुरू हो जाएगी। शिवरात्रि रात्रि का पर्व है और 21 फरवरी की रात चतुर्दशी तिथि रहेगी, इसलिए इस साल ये पर्व 21 फरवरी को मनाया जाएगा। इस बार शिवरात्रि पर 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग बन रहा है।

यह दुर्लभ योग 1903 में बना था

इस बार शिवरात्रि पर शनि अपनी स्वयं की राशि मकर में और शुक्र ग्रह अपनी उच्च राशि मीन में रहेगा। ये एक दुर्लभ योग है, जब ये दोनों बड़े ग्रह शिवरात्रि पर इस स्थिति में रहेंगे। 2020 से पहले 25 फरवरी 1903 को ठीक ऐसा ही योग बना था और शिवरात्रि मनाई गई थी।

इस साल गुरु भी अपनी स्वराशि धनु राशि में स्थित है। इस योग में शिव पूजा करने पर शनि, गुरु, शुक्र के दोषों से भी मुक्ति मिल सकती है। 21 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग भी रहेगा। पूजन के लिए और नए कार्यों की शुरुआत करने के लिए ये योग बहुत ही शुभ माना गया है।

महाशिवरात्रि पर 28 साल बाद बनेगा विष योग

इस साल शनि ने 23 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश किया है। शिवरात्रि यानी 21 फरवरी पर शनि के साथ चंद्र भी रहेगा। शनि-चंद्र की युति की वजह से विष योग बन रहा है। इस साल से पहले करीब 28 साल पहले शिवरात्रि पर विष योग 2 मार्च 1992 को बना था।

इस योग में शनि और चंद्र के लिए विशेष पूजा करनी चाहिए। शिवरात्रि पर ये योग बनने से इस दिन शिव पूजा का महत्व और अधिक बढ़ गया है। कुंडली में शनि और चंद्र के दोष दूर करने के लिए शिव पूजा करने की सलाह दी जाती है।

बुधादित्य और सर्प योग भी रहेंगे शिवरात्रि पर 21 फरवरी को बुध और सूर्य कुंभ राशि में एक साथ रहेंगे, इस वजह से बुध-आदित्य योग बनेगा। इसके अलावा इस दिन सभी ग्रह राहु-केतु के मध्य रहेंगे, इस वजह से सर्प भी बन रहा है।

शिवरात्रि पर राहु मिथुन राशि में और केतु धनु राशि में रहेगा। शेष सभी ग्रह राहु-केतु के बीच रहेंगे। सूर्य और बुध कुंभ राशि में, शनि और चंद्र मकर राशि में, मंगल और गुरु धनु राशि में, शुक्र मीन राशि में रहेगा। सभी ग्रह राहु-केतु के बीच होने से सर्प योग बनेगा।

महाशिवरात्रि के दिन भक्त जप, तप और व्रत रखते हैं और इस दिन भगवान के शिवलिंग रूप के दर्शन करते हैं। इस पवित्र दिन पर देश के हर हिस्सों में शिवालयों में बेलपत्र, धतूरा, दूध, दही, शर्करा आदि से शिव जी का अभिषेक किया जाता है। देश भर में महाशिवरात्रि को एक महोत्सव के रुप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन देवों के देव महादेव का विवाह हुआ था।

हमारे धर्म शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि महाशिवरात्रि का व्रत करने वाले साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। जगत में रहते हुए मुष्य का कल्याण करने वाला व्रत है महाशिवरात्रि। इस व्रत को रखने से साधक के सभी दुखों, पीड़ाओं का अंत तो होता ही है साथ ही मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है।

शिव की साधना से धन-धान्य, सुख-सौभाग्य,और समृद्धि की कमी कभी नहीं होती। भक्ति और भाव से स्वत: के लिए तो करना ही चाहिए सात ही जगत के कल्याण के लिए भगवान आशुतोष की आराधना करनी चाहिए। मनसा…वाचा…कर्मणा हमें शिव की आराधना करनी चाहिए। भगवान भोलेनाथ..नीलकण्ठ हैं, विश्वनाथ है।

सनातन हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रदोषकाल यानि सूर्यास्त होने के बाद रात्रि होने के मध्य की अवधि, मतलब सूर्यास्त होने के बाद के 2 घंटे 24 मिनट की अवधि प्रदोष काल कहलाती है। इसी समय भगवान आशुतोष प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते है।

इसी समय सर्वजनप्रिय भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। यही वजह है, कि प्रदोषकाल में शिव पूजा या शिवरात्रि में औघड़दानी भगवान शिव का जागरण करना विशेष कल्याणकारी कहा गया है। हमारे सनातन धर्म में 12 ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। कहा जाता है।

महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म में काफी महत्वपूर्ण पर्व है। जिस दिन शिव भक्त अपने आराध्य शंकर जी और मां पार्वती के विवाह की खुशियां मनाते हैं।

आज है महाशिवरात्रि करिए भोले भंडारी का जाप उनके जार से धुलते हैं सारे पाप।

महाशिवरात्रि पर्व को धूमधाम मनाने के लिए तैयार हो चुकी है। इस अवसर पर लोग मंदिरों में जाकर भोले बाबा का रुद्राभिषेक कराते हैं।

महादेव को उनके भक्त कई नामों से जानते हैं। उनका एक नाम त्रिपुरारी भी है। वैसे भगवान शिव के साथ 3 अंक का अद्भुत संयोग है। जैसे उनका अस्त्र त्रिशूल, उनके माथे पर तीसरी आंख और मस्तक पर लगा त्रिपुंड भी तीन रेखाओं वाला होता है।

महाशिवरात्रि हो या सत्यनारायण भगवान की कथा प्रसाद में पंचामृत का विशेष स्थान होता है। इसे शुभ और कल्याणकारी तो माना ही जाता है सेहत के लिए भी यह काफी फायदेमंद होता है

इस घटना के कारण मनाई जाती है महाशिवरात्रि :

शिवरात्रि तो हर महीने में आती है लेकिन महाशिवरात्रि सालभर में एकबार आती है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। इस बार यह पर्व 4 मार्च दिन सोमवार को है। महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए है क्योंकि यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है। शिवभक्त इस दिन व्रत रखकर अपने आराध्य का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है, इसके पीछे की घटना क्या है।

पहली बार प्रकट हुए थे शिवजी : पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका न तो आदि था और न अंत। बताया जाता है कि शिवलिंग का पता लगाने के लिए ब्रह्माजी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला।

इन 64 जगहों पर प्रकट हुए थे शिवलिंग : एक और कथा यह भी है कि महाशिवरात्रि के दिन ही शिवलिंग विभिन्न 64 जगहों पर प्रकट हुए थे। उनमें से हमें केवल 12 जगह का नाम पता है। इन्हें हम 12 ज्योतिर्लिंग के नाम से जानते हैं। महाशिवरात्रि के दिन उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में लोग दीपस्तंभ लगाते हैं। दीपस्तंभ इसलिए लगाते हैं ताकि लोग शिवजी के अग्नि वाले अनंत लिंग का अनुभव कर सकें। यह जो मूर्ति है उसका नाम लिंगोभव, यानी जो लिंग से प्रकट हुए थे। ऐसा लिंग जिसकी न तो आदि था और न ही अंत।

इसी दिन शिव और शक्ति का हुआ था मिलन : महाशिवरात्रि को पूरी रात शिवभक्त अपने आराध्य जागरण करते हैं। शिवभक्त इस दिन शिवजी की शादी का उत्सव मनाते हैं। मान्यता है कि महाशिवरात्रि को शिवजी के साथ शक्ति की शादी हुई थी। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। शिव जो वैरागी थी, वह गृहस्थ बन गए। माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है।

महाशिवरात्रि व्रत रखने का यह है वैज्ञानिक महत्व :

‘महाशिवरात्रि’ यानी शिव और शक्ति के संगम का दिन…अद्र्धनारीश्वर स्वरूप की आराधना का दिन। सोमवार की मध्यरात्रि में भगवान भोलेनाथ और मां गौरी का विवाह होगा। मन:कामेश्वर महादेव मंदिर के महंत योगेशपुरी कहते है कि बाबा मन:कामेश्वर दूल्हा बनकर जब निकलेंगे तो पूरा शहर उनको देखने के लिए पलक पांवड़े बिछाए होगा।

ज्योतिषाचार्य पूनम वाष्र्णेय ने बताया कि एक साल में 12 शिवरात्रि पड़ती है लेकिन इन 12 में से फाल्गुन की शिवरात्रि का महत्व कई गुना अधिक है। यह शिवरात्रि कोई साधारण शिवरात्रि नहीं बल्कि महाशिवरात्रि होती है। इस दिन शिव को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा जाता है। शिव की पूजा पूजा और भक्ति करने से ही कष्ट दूर हो जाते हैं। सच्चे मन से शिव भक्ति करने वाले भक्तों पर उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।

व्रत रखने से तन का शुद्धीकरण होता है। व्रत रखने से रक्त शुद्ध होता है। आतों की सफाई होती है। पेट को आराम मिलता है। उत्सर्जन तंत्र और पाचन तंत्र, दोनों ही अपनी अशुद्धियों से छुटकारा पाते हैं। कई रोगों से मुक्ति मिलती है। श्वसन तंत्र ठीक होता है। उपवास रखने से कलोस्ट्रोल के स्तर कम होता है। व्रत से स्मरण शक्ति बढ़ती है। वृत वाले दिन मेटाबॉलिक रेट में तीन से 14 फीसदी तक की बढ़ोतरी होती है। दिमाक स्वस्थ रहता है।

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