fbpx
Home » मधुमेह » पैर के तलवे पर आक का पत्ता बांधने के फायदे

पैर के तलवे पर आक का पत्ता बांधने के फायदे

वैसे तो ये पौधा हर जगह देखने को मिल जाता है लेकिन इसके उपयोग की जानकारी कम लोगो को है तो यहाँ हम आपको इसके प्रयोग की जानकारी दे रहे है. आक-अर्क के पौधे, शुष्क, ऊसर और ऊँची भूमि में प्राय: सर्वत्र देखने को मिलते हैं। इस वनस्पति के विषय में साधारण समाज में यह भ्रान्ति फेंली हुई है कि आक का पौधा विषेला होता है तथा यह मनुष्य के लिये घातक है।

इसमें किंचित सत्य जरूर है क्योकि आयुर्वेद संहिताओं मे भी इसकी गणना उपविषों में की गई है। यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उलटी दस्त होकर मनुष्य यमराज के घर जा सकता है। आक के रासायनिक तत्वों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि इसकी जड़ और तने में एमाईरिन, गिग्नटिओल तथा केलोट्रोपिओल के अलावा थोड़ी मात्रा में मदार ऐल्बन, फ्लेबल क्षार भी मिलता है।

 

दूध में ट्रिप्सिन, उस्कैरिन, केलोट्रोपिन तथा केलोटोक्सिन तत्व मिलते हैं। आक का रस कटु (कड़वा), तिक्त (तीखा), उष्ण (गर्म) प्रकृति, वात-कफ दूर करने वाला, कान-दर्द, कृमि (कीड़ा), अर्श (बवासीर), खांसी, कब्ज, पेट के रोग, त्वचा रोग, वात रोग, सूजन नाशक होता है। इसके विपरीत यदि आक का सेवन उचित मात्रा में, योग्य तरीके से, चतुर वैद्य की निगरानी में किया जाये तो अनेक रोगों में इससे बडा फायदा होता है। इसका हर अंग दवा है, हर भाग उपयोगी है एवं यह सूर्य के समान तीक्ष्य। तेजस्वी और पारे के समान उत्तम तथा दिव्य रसायन धर्मा हैं।

 

इसका रूप, रंग, पहचान :

यह पौधा अकौआ एक औषधीय पादप है। इसको मदार, मंदार, आक, अर्क भी कहते हैं. इसका वृक्ष छोटा और छत्तादार होता है. पत्ते बरगद के पत्तों समान मोटे होते हैं। हरे सफेदी लिये पत्ते पकने पर पीले रंग के हो जाते हैं.

इसका फूल सफेद छोटा छत्तादार होता है। फूल पर रंगीन चित्तियाँ होती हैं. फल आम के तुल्य होते हैं जिनमें रूई होती है। आक की शाखाओं में दूध निकलता है। वह दूध विष का काम देता है. आक गर्मी के दिनों में रेतिली भूमि पर होता है। चौमासे में पानी बरसने पर सूख जाता है।

आक या मदार के फायदे :

शुगर और बाहर निकला पेट : आक के पौधे की पत्ती को उल्टा (उल्टा का मतलब पत्ते का खुदरा भाग) कर के पैर के तलवे से सटा कर मोजा पहन लें। सुबह और पूरा दिन रहने दे रात में सोते समय निकाल दें या फिर रात को लगा दे और सुबह निकाल ले। एक सप्ताह में आपका शुगर लेवल सामान्य हो जायेगा। साथ ही बाहर निकला पेट भी कम हो जाता है।

घाव : आक का हर अंग दवा है, हर भाग उपयोगी है। यह सूर्य के समान तीक्ष्ण तेजस्वी और पारे के समान उत्तम तथा दिव्य रसायनधर्मा हैं। कहीं-कहीं इसे ‘वानस्पतिक पारद’ भी कहा गया है। आक के कोमल पत्ते मीठे तेल में जला कर अण्डकोश की सूजन पर बाँधने से सूजन दूर हो जाती है। तथा कडुवे तेल में पत्तों को जला कर गरमी के घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।

खाँसी : इसके कोमल पत्तों के धुंए से बवासीर शाँत होती है. आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है. सूजन दूर हो जाती है. आक की जड के चूर्ण में काली मिर्च पिस कर मिला ले और छोटी छोटी गोलियाँ बना कर खाने से खाँसी दूर होती है।

सिर का दर्द : आक की जड की राख में कडुआ तेल मिलाकर लगाने से खुजली अच्छी हो जाती है. आक की सूखी डँडी लेकर उसे एक तरफ से जलावे और दूसरी ओर से नाक द्वारा उसका धूँआ जोर से खींचे सिर का दर्द तुरंत अच्छा हो जाता है।

शीत ज्वर शाँत : आक की जड को पानी में घीस कर लगाने से नाखूना रोग अच्छा हो जाता है. आक की जड छाया में सुखा कर पीस लेवे और उसमें गुड मिलाकर खाने से शीत ज्वर शाँत हो जाता है.

गठिया : आक की जड 2 सेर लेकर उसको चार सेर पानी में पकावे जब आधा पानी रह जाय तब जड निकाल ले और पानी में 2 सेर गेहूँ छोडे जब जल नहीं रहे तब सुखा कर उन गेहूँओं का आटा पिसकर पावभर आटा की बाटी या रोटी बनाकर उसमें गुड और घी मिलाकर प्रतिदिन खाने से गठिया बाद दूर होती है। बहुत दिन की गठिया 21 दिन में अच्छी हो जाती है।

बवासीर के मस्से : आक का दूध पाँव के अँगूठे पर लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है। बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से जाते रहते हैं। बर्रे काटे में लगाने से दर्द नहीं होता। चोट पर लगाने से चोट शाँत हो जाती है।

उड़े हुए बाल : जहाँ के बाल उड़ गये हों वहाँ पर आक का दूध लगाने से बाल उग आते हैं। लेकिन ध्यान रहे इसका दूध आँख में नहीं जाना चाहिए वर्ना आँखें खराब हो जाती है। उपरोक्त कोई भी उपाय अपनी ज़िम्मेदारी पर सावधानी से ही करें।

बवासीर : आक के कोमल पत्तों के बराबर की मात्रा में पांचों नमक लेकर, उसमें सबके वजन से चौथाई तिल का तेल और इतना ही नींबू रस मिलाकर पात्र के मुख को कपड़ मिट्टी से बन्दकर आग पर चढ़ा दें। जब पत्ते जल जाये तो सब चीजों को निकालकर पीसकर रख लें। इसे 500 मिलीग्राम से 3 ग्राम तक आवश्यकतानुसार गर्म जल, छाछ या शराब के साथ सेवन कराने से बादी बवासीर नष्ट हो जाती है।

जोड़ों में दर्द होने पर : आक का फूल, सोंठ, कालीमिर्च, हल्दी व नागरमोथा को बराबर मात्रा में लें। इन्हें जल के साथ महीन पीसकर चने जैसी गोलियां बना लें। 2-2 गोलियां सुबह और शाम को जल के साथ सेवन करें।

दाद : आक (मदार) के दूध को हल्दी के साथ तिल के तेल में उबालकर दाद में या एक्जिमा में लेप करने से लाभ होता है।

बहरापन : आक (मदार) के पत्तों पर घी लगाकर आग में गर्म करके उसका रस निचोड़ लें। इस रस को हल्का सा गर्म करके रोजाना कान में डालने से कान का बहरापन ठीक हो जाता है।

कील-मुहासें : हल्दी में आक के दूध को मिलाकर कील मुंहासों पर लेप करने से कुछ ही दिनों में लाभ होगा और चेहरे पर चमक आएगी।

हिलते हुए दांत निकालना : हिलते हुए दांत की जड़ में एक-दो बूंद आक का दूध लगाने से वह आसानी से निकल जाता है। आक की जड़ के टुकड़े को दुखते हुए दांत से दबाने से दर्द कम हो जाता है।

खुजली : आक के 10 सूखे पत्ते सरसों के तेल में उबालकर जला लें। फिर तेल को छानकर ठंडा होने पर इसमें कपूर की 4 टिकियों का चूर्ण अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भर लें। यह तेल खाज-खुजली वाले अंगों पर दिन तीन बार लगाएं। इससे खुजली ठीक हो जाती है।

इसके हानिकारक प्रभाव :

आक का पौधा विषैला होता है। आक की जड़ की छाल अधिक मात्रा में प्रयोग करने से आमाशय और आंतों में जलन उत्पन्न होकर जी मिचलाहट यहां तक कि उल्टी भी होने लगती है इसका ताजा दूध अधिक मात्रा में देने से विष का कार्य करता है। अत: प्रयोग में मात्रा का विशेष ध्यान रखें। आक के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए घी और दूध का उपयोग किया जाता है।

1 Comment

  1. Pallavi Pandya
    July 22, 2020 / 8:51 am

    No one will know so many qualities of mud tree. This article gave a lot of useful information about Aak. Thank you.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *