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14 हफ्ते में कैंसर सहित 172 बीमारियों को ठीक करने का दावा



छतरपुर से 25 किलोमीटर दूर ईशानगर के पचेर से सटे  टीकमगढ़ के खरगापुर के चिनगुवां गांव के जंगल में माता का दरबार सजा हुआ है, जहां स्थित छोटे से मंदिर में एक युवती मौन धारण किए माता के रूप में विराजमान है। भगवाधारी यह युवती एवं इसके अनुयायी जड़ी-बूटी वाले पानी से असाध्य बीमारियों से निजात दिलाने का दावा कर रहे हैं। इस चमत्कारी माता का दावा है कि इनके पानी से 14 हफ़्तों में कैंसर जैसी बीमारी ठीक हो जाती है।

यहां पहुंचने वाले लोगों का विश्वास है कि जिस बीमारी का इलाज दुनिया में कहीं नहीं है, उसका इलाज यहां होता है। लोगों का दावा है कि यहां मनुष्यों की 172 प्रकार की बीमारियों का सफल इलाज होता है। हर रविवार और बुधवार को दूर-दूर से लोग लाखों की संख्या में यहां पहुंच भी रहे हैं। कैंसर की लास्ट स्टेज वाले रोगी भी यहां इस उम्मीद से पहुंच रहे हैं कि यहां के पानी से उनका जीवन बच जाएगा।

कैंसर पीड़ितों को यहां का जड़ी-बूटी युक्त पानी माता के हाथों से पीना और आशीर्वाद लेना पड़ता है, जबकि घाव के लिए जड़ी-बूटी पिसकर लगाने को दी जाती है। यहां इलाज कराने के लिए लोग मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, सहित देशभर के अन्य प्रांतों से भी पहुंच रहे हैं।


यहां रुकने के इंतजाम न हो पाने के चलते लोग जंगल में ही पेड़ों पर झूला, मचान बनाकर और झुग्गी, मच्छरदानी, पन्नी तानकर रह रहे हैं। लोगों की भीड़ से स्थानीय लोगों सहित टैक्सी, ऑटो, बस वालों की चांदी हो गई है। रविवार और बुधवार को यहां हजारों की संख्या में वाहन आते-जाते रहते हैं।

एक ओर जहां छतरपुर की शालिनी यादव को इलाज हेतु विदेश (स्पेन) जाना पड़ा तो वहीं छतरपुर में हर लाइलाज बीमारी के इलाज़ का दावा किया जा रहा है। क्या यही अंधविश्वास में आस्था है।

बीमारी-कैंसर, टीवी, लकवा, हार्टअटैक, पथरी, शुगर, ब्लडप्रेशर, बांझपन, नामर्दी, रीढ़, हाथ, पैर, सिर, मुंह, पेट, पीठ, कमर, घुटने सहित अन्य 172 प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए लोग यहां पहुंच रहे हैं। दूरदराज से आए लोग जंगल में ही झुग्गी बनाकर रात-दिन डेरा जमाए बैठे हैं, ताकि बुधवार और रविवार को लगातार इलाज करा सकें। ईतना ही नहीं यहां सैकड़ों की संख्या में छोटी-बड़ी दुकानें खुल गई हैं। खाना से लेकर चाय-नाश्ता, चाट-पकौड़ी, धूम्रपान, जनरल और भी कई प्रकार के रोजमर्रा के सामानों की दुकानें खुल गईं हैं। यहां छोटे-छोटे बच्चों ने भी दुकानें लगा रखीं हैं, जो नारियल, अगरबत्ती, प्लास्टिक के डिब्बे बेचने लगे हैं, जो रोजाना 200 से 300 रुपए कमा रहे हैं।




लोगों को पीने के पानी के लिए चढ़ावे से ही एक बोर कराया गया है। खाने के लिए यहां रोजाना भंडारा होता है जिसमें सुबह-शाम लोगों को खिचड़ी का वितरण किया जाता है। महिलाएं यहां भजन-कीर्तन कर रही हैं। यहां कई किलोमीटर तक जनता दिखाई देती है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था के कोई इंतजाम नहीं हैं।

यह डर भी है : व्यवस्थापकों को यह डर भी सता रहा है कि भारी भीड़ के चलते यहां भगदड़ या कोई हादसा हो सकता है। लाखों की भीड़ को मात्र 4 पुलिस वाले ही जैसे-तैसे संभाल रहे हैं। यहां व्यवस्था संभाल रहे लोगों का कहना है कि हमने एसपी को आवेदन दिया है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

Note : हम किसी भी तरह के अंध विश्वास को बढ़ावा नही दे रहे और ना ही समर्थन कर रहे है, हम सिर्फ वहाँ पर दी जाने वाली जडी-बुटी के बारे में बताना चाहते है तभी यह पोस्ट की है, वहाँ रोगियों केे ठीक होने का जो भी करिश्मा होता है वो जडी-बुटी से होता है।
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