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उज्जायी प्राणायाम से शरीर में प्राणशक्ति की वृद्धि होती है और मन प्रसन्न व शांत रहता है, यह इच्छाशक्ति को बढ़ाता है, शरीर को सुन्दर, स्वस्थ तथा चमकदार बनाता है


´उज्जायी´ शब्द का अर्थ है ´विजयी या जीतने वाला। इस प्राणायाम के अभ्यास से श्वसन (वायु) को जीता जाता है। यह कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने में लाभकारी होता है। इस प्राणायाम का अभ्यास स्त्री-पुरुष दोनों के लिए लाभकारी माना गया है। इस प्राणायाम का अभ्यास साफ-स्वच्छ हवा बहाव वाले स्थान पर करें। इसका अभ्यास तीन प्रकार से किया जा सकता है- खड़े होकर, लेटकर तथा बैठकर। उज्जायी प्राणायाम के अभ्यास की 3 विधि

बैठकर अभ्यास करने की विधि-
उज्जायी प्राणायाम के अभ्यास के लिए पहले पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। अपने मुंह को बन्द करके रखें और नाक के दोनों छिद्रों से वायु को अन्दर खींच (पूरक करें)। वायु को तब तक अन्दर खींचे जब तक वायु फेफड़े में पूर्ण रूप से न भर जाए। फिर कुछ देर वायु को अन्दर ही रोककर नाक के दाएं छिद्र को बन्द करके बाएं छिद्र से वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें (रेचक करें)। वायु को अन्दर खींचते समय छाती को फुलाकर रखें। ध्यान रखें कि वायु को अन्दर खींचते व बाहर छोड़ते समय गले से खर्राटें की आवाज निकलनी चाहिए। इस तरह इस क्रिया का पहले 5 बार अभ्यास करें और धीरे-धीरे अभ्यास की संख्या बढ़ाते हुए 20 बार तक कर दें।
कुछ योग शास्त्रों में उज्जायी प्राणायाम के साथ बन्धों को लगाकर अभ्यास करने को कहा गया है। उज्जायी प्राणायाम में बन्ध को लगाकर अभ्यास करने की विधि-
पहले पद्मासन या सुखासन में बैठकर गहरी सांस लें (वायु को अन्दर खींचें)। वायु अन्दर भरने के बाद सांस को रोककर जालन्धर बन्ध लगायें और आंखों को बन्द करके सांस को बाहर निकालें। सांस को 1 या 2 सैकेंड तक अन्दर रोककर (कुम्भक कर) मूलबन्ध लगाएं। मूलबन्ध लगाने के लिए गुदाद्वार को सिकोड़ें। अब इस स्थिति में जितनी देर तक रहना सम्भव हो, रहें और फिर मूलबन्ध को खोलते हुए सांस को नाक के बाएं छिद्र से बाहर निकाल दें। सांस पूर्ण रूप से बाहर निकलने के बाद कुछ सैकेंड तक सांस को बाहर ही रोककर रखें और फिर सांस अन्दर खींचें।
ध्यान रखें कि इस क्रिया को आंखों को बन्द करके ही करें तथा शुरू-शुरू में इसका अभ्यास 5 बार करें और धीरे-धीरे अभ्यास की मात्रा बढ़ाते जाएं।

खड़े होकर अभ्यास करने की विधि-
उज्जायी प्राणायाम के अभ्यास के लिए पहले सीधे खड़े हो जाएं। दोनों पैरों की एड़ियों को मिलाकर और पंजों को फैलाकर रखें। अपनी आंखों को सामान्य ऊंचाई पर सामने की ओर रखें। दोनों हाथों को दोनों बगल में सामान्य रूप से रखें। शरीर को बिल्कुल सीधा रखें। इसके बाद अपनी जीभ को नली की तरह बनाकर होठों के बीच से हल्का बाहर निकालें और उस नली से ही अन्दर की वायु को मुंह के द्वारा बाहर निकाल दें। जब पूर्ण रूप से अन्दर की वायु बाहर निकल जाए, तो मुंह को बन्द करके नाक के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे व गहरी सांस लें। ध्यान रखें की सांस अन्दर खींचते समय अधिक जोर न लगाएं। सांस लेने के बाद सांस को जितनी देर तक अन्दर रोककर रखना सम्भव हो रोककर रखें (कुम्भक करें)। इसके बाद शरीर को हल्का ढीला करते हुए सांस को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें (रेचक करें)। इस तरह एक बार करने के बाद 7-8 सैकेंड तक आराम करें। इस तरह इस क्रिया को पहले दिन 3 बार ही करें और धीरे-धीरे इसके अभ्यास को बढ़ाते जाएं। इस प्राणायाम का अभ्यास 24 घंटे में एक बार करें।

लेटकर अभ्यास करने की विधि-
उज्जायी प्राणायाम के अभ्यास के लिए फर्श पर कुछ बिछाकर सीधे लेट जाएं। अपने पूरे शरीर को बिल्कुल सीधा रखें और दोनों हाथों को दोनों बगल में फर्श पर रखें। दोनों पैरों को सटाकर रखें। अपने पूरे शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ें और दृष्टि को ऊपर की ओर रखें। अब धीरे-धीरे गहरी व लम्बी सांस लें। फिर अपने शरीर को तान कर क्षमता के अनुसार वायु को अन्दर ही रोककर रखें और फिर शरीर को ढीला छोड़कर सांस (वायु) को बाहर छोड़ें (रेचक करें)। इस तरह एक चक्र खत्म होने पर 2 से 3 सैकेंड आराम करें और पुन: इस क्रिया को करें।

उज्जायी प्राणायाम से लाभ-
यह अध्यात्म व ध्यान के लिए अधिक उपयोगी प्राणायाम है। उज्जायी प्राणायाम से शरीर में प्राणशक्ति की वृद्धि होती है और मन प्रसन्न व शांत रहता है। यह इच्छाशक्ति को बढ़ाता है, शरीर को सुन्दर, स्वस्थ तथा चमकदार बनाता है। उज्जायी प्राणायाम के अभ्यास से शरीर की गर्मी कम होती है। यह जठराग्नि प्रदीप्ति करता है, पाचनशक्ति को बढ़ाता है, भूख को बढ़ाता है तथा कफ विकार को रोकता है। यह दमा के रोग में भी लाभकारी है तथा शरीर में उत्पन्न कफ, पित्त व वायु की मात्रा को बराबर करता है। कुम्भक के बिना अभ्यास करने से अनिद्रा (नींद का न आना) दूर होता है। यह बाहरी व आंतरिक स्नायुमण्डल को मजबूत व शुद्ध करता है और कार्यशील बनाता है। यह शरीर के सभी अंगों को शक्तिशाली व पुष्ट बनाता है। यह थायराइड, पैराथाईराईड ग्रंथियों पर विशेष प्रभाव डालता है। इससे हृदय तथा फेफड़ों के विकार दूर होते हैं तथा हृदय की धड़कन सामान्य बनी रहती है। इसमें शुद्ध वायु के प्रवाह से खून साफ होता है तथा कब्ज, अपच (भोजन का न पचना), वायुविकार, खांसी, ज्वर आदि रोग दूर होते हैं। इसका अभ्यास उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) वाले रोगी को भी करना चाहिए। इसके अभ्यास से गलगंड, गण्डमाला, टांसिल, ग्वाइटर, खराश आदि गले के रोग ठीक होते है। यह पुरुष के गुप्त रोगों जैसे नपुंसकता व स्वप्न दोष को दूर करता है।

स्त्री रोग-
यह प्राणायाम स्त्रियों के गुप्त रोगों में भी लाभकारी होता है। इसको करने से सफेद प्रदर, डिसमीनोरिया, गर्भाशय, मासिकधर्म सम्बन्धी सभी रोग दूर होते हैं।

विशेष-
जब सांस को बाहर की ओर छोड़े तो मन में यह सोचे की अन्दर की सारी दूषित वायु बाहर निकल रही है तथा सांस अन्दर खींचते समय यह ध्यान करें कि बाहर से शुद्ध वायु अन्दर प्रवेश कर रही है। प्राणायाम के साथ बन्ध लगाने से नाभि में स्थिति ऊर्जा शक्ति (कुण्डलिनी) जागृत होती है।

आवश्यक सावधानी-
पूरक, कुम्भक और रेचक इन तीनों क्रियाओं में यदि पूरक 1 सैकेंड में करते हैं, तो कुम्भक 4 सैकेंड में और रेचक 2 सैकेंड में खत्म करना चाहिए। इस क्रिया में नाक के दोनों छिद्रों से सांस लेकर ही पूरक करना चाहिए और पूरक के दुगने समय में रेचक करना चाहिए। ध्यान रखें कि प्राणायाम के अभ्यास के समय नाक, मुंह आदि को सिकोड़ना या मुंह की बुरी आकृति बनाकर अभ्यास नहीं करना चाहिए।
इस क्रिया में कुम्भक करते समय सिरदर्द या चक्कर आदि आने लगते हैं, जिनका कारण अभ्यास के समय स्वच्छ वायु का न मिलना तथा कब्ज बढ़ाने वाले पदार्थों का सेवन करना होता है। इन कारणों को दूर करके अभ्यास करें तथा सिर में चक्कर उत्पन्न होने पर सांस लेने व रोकने के समय को कम कर दें।
जिसे खड़े होकर इसका अभ्यास करने में परेशानी होती है, जिनका शरीर कमजोर हो या खड़े होकर अभ्यास करने से जिन्हें सिर में चक्कर आते हों, उन्हें लेटकर ही इस प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।
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