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पुराने से पुराना शुक्रमेह (धातु गिरना) से निजात पाइये सिर्फ एक रामबाण उपाय से


★ पुराने से पुराना शुक्रमेह (धातु गिरना)  से निजात पाइये सिर्फ एक रामबाण उपाय से ★


● शुक्रमेह अर्थात धातु गिरना क्या है?

          शुक्रमेह अर्थात वीर्य का अपने आप निकल जाना होता है। इस रोग में रोगी को पेशाब करते समय वीर्य भी निकल जाता है। इस रोग के वही कारण होते हैं जो स्वप्नदोष रोग होने के होते हैं।
शुक्रमेह रोग क्या है-
           जब किसी पुरुष का लिंग उत्तेजित अवस्था में होता है अर्थात बिल्कुल सख्त हो जाता है तो उस समय उसके लिंग में से थोड़ी सी मात्रा में पानी के रंग की पतली सी लेस निकलती है। यह लेस इतनी थोड़ी सी होती है कि बाहर नहीं आती लेकिन जब पुरुष का लिंग उत्तेजित अवस्था में काफी देर तक रहता है लेकिन वह संभोग नहीं करता तो यह लेस लिंग के मुंह तक आ जाती है। इसे मजी (Prostatic Secretion) कहते हैं। इस लेस के अंदर वीर्य का बिल्कुल भी अंश नहीं होता है। इसे प्रकृति ने सिर्फ संभोग के समय लिंग की नली को गीला करने के लिए बनाया है ताकि संभोग करते समय वीर्य की तेज गति के कारण लिंग छिल न जाए।
           बहुत से युवक किशोरावस्था से हस्तमैथुन या दूसरे तरीकों के द्वारा अपना वीर्य बर्बाद करने लगते है या मन ही मन किसी भी लड़की के साथ सेक्स करने के ख्यालों में खोए रहते हैं या स्त्री के पास लेटे-लेटे संभोग करने से पहले प्यार भरी छेड़छाड़ करते रहते हैं तो उनकी यह लेस बहुत ज्यादा मात्रा में बहने लगती है और कुछ समय के बाद हालत यह हो जाती है कि मन में किसी लड़की का विचार आते ही लिंग में से यह लेस अपने आप ही ज्यादा मात्रा में निकलने लगती है और युवक की उत्तेजना बिल्कुल शांत हो जाती है। इस रोग को हिन्दी में शुक्रमेह (लालामेह) और अंग्रेजी मेंProstatorrhea कहते हैं।
शुक्रमेह (वीर्य का अपने आप निकलना) के बारे में जानकारी-
  • शुक्रमेह रोग में रोगी को सबसे पहले एक चीज नोट करनी चाहिए कि उसका वीर्य दिन में किस समय, कितनी बार और किस रंग का निकलता है जैसे लेसदार, पानी के रंग का, दूध के रंग का, पतला या गाढ़ा। वीर्य पेशाब करने से पहले निकलता है या पेशाब करने के बाद या मन में सेक्स के प्रति विचार आने के बाद निकलता है। अगर इस रोग में भोजन करने के बाद वीर्य निकलता है तो भोजन करने के कितनी देर बाद। अगर शौच करते समय पेशाब के साथ वीर्य निकलता है तो क्या कब्ज की हालत में। इन बातों से रोग की विभिन्न दशाओं का पता लगता है।
  • अगर भोजन करने से 3-4 घंटे पहले पेशाब गाढ़ा सा आता है तो समझना चाहिए कि पाचनशक्ति खराब है। बहुत से चिकित्सकों के पास जब रोगी इस तरह की शिकायत लेकर आता है तो वह उसको यह कहकर डरा देते हैं कि हड्डी घुल रही है। लेकिन असल में यह ज्यादा गरिष्ट भोजन करने से और पाचनतंत्र के कमजोर होने से होता है जिसे फास्फेटस् कहा जाता है। अगर पाचनशक्ति के ठीक होने से पेशाब में वीर्य निकलने का रोग दूर हो जाता है तो इसका लक्षण पेशाब का रंग पीला हो जाना होता है।
  • बहुत से चिकित्सक पेशाब में वीर्य जाने के रोग की जांच कराने के लिए रोगी से कहते है कि अपने पेशाब को एक शीशी में भरकर रख लें। अगर उस शीशी में 2-3 घंटे के बाद नीचे कोई पदार्थ बैठ जाता है तो समझ जाना कि तुम्हें शुक्रमेह रोग है। लेकिन यह जांच किसी सिरे से ठीक नहीं है क्योंकि अगर भोजन नहीं पचता तो वह भी नीचे ही बैठ जाता है। रोगी व्यक्ति के पेशाब में यह अनपचा भोजन ज्यादा होता है और स्वस्थ व्यक्ति में कम। यह बात गलत है कि यह वीर्य ही होता है।
  • शौच करते समय ज्यादा जोर नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ज्यादा जोर लगाने से वीर्याशय पर जोर पड़ता है। शौच करते समय जितनी शोच आसानी से आ जाए उतना ही करना चाहिए और फिऱ उठ जाना चाहिए। अगर दिन में 2-3 बार शौच के लिए जाना पड़ जाए तो इसमें चिंता की कोई बात नहीं है।
  • युवावस्था में अगर स्वप्नदोष जैसी कोई समस्या न हो लेकिन कभी-कभी पेशाब में वीर्य निकलता हुआ सा प्रतीत हो तो इसमें चिंता करने की कोई बात नहीं है क्योंकि स्वस्थ पुरूषों के साथ भी कभी-कभार ऐसा हो जाता है।

★ आयुर्वेदिक उपचार :
           लगभग 50-50 ग्राम शतावरी, मुलहटी और सालब-मिसरी, 25-25 ग्राम बंशलोचन, छोटी इलायची के बीज और शीतलचीनी और 4 ग्राम बंगभस्म को अलग-अलग पीसकर लगभग 60 ग्राम चांदी के वर्क में मिला लें। इसको लगभग 60 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम गाय के दूध के साथ सेवन करने से पुराने से पुराना शुक्रमेह का रोग दूर हो जाता है।
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