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मूली के ये 90 चमत्कारिक फायदे जानकर दंग जाओगे फिर इसको रोज खाओगे सलाद में


★ मूली के ये 90 चमत्कारिक फायदे जानकर दंग  जाओगे फिर इसको रोज खाओगे सलाद में ★

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   मूली पूरे भारत में पैदा होती है। मूली भी गाजर की तरह जमीन के अन्दर कन्दरूप में पैदा होती है। मूली की मुख्य दो किस्में होती है-सफेद और छोटी सफेद लाल। इसकी गोल आदि अन्य किस्में भी होती हैं। अक्टूबर-नवंबर में मूली खाने योग्य मानी जाती है। मूली कच्ची खाई जाती है। मूली और मूली के पत्तों का साग भी बनता है। मूली के पत्तों में बेसन मिलाकर स्वादिष्ट तरकारी भी बनाते हैं। मूली के बीजों से तेल निकलता है। मूली का तेल वजन में पानी से भारी और रंग रहित होता है। भोजन के मध्य में कच्ची मूली खाने से भोजन करने में रुचि बढ़ती है। मूली के गोलाकार टुकड़े कर थोड़ा-सा नमक छिड़ककर सुबह के समय रोटी के साथ खाना लाभदायक है।

विभिन्न भाषाओं में नाम:

हिन्दीमूली, मूला
संस्कृतचाणक्यमूलक, भूमिकक्षार, दीर्घकन्द
गुजरातीमूला
मराठीमुड़ा
बंगालीमूला
पंजाबीमूली
अरबीफजलहुज़ल
अंग्रेजी नामरेडिस
कुलनामब्रेसिसीकाज
वैज्ञानिक नामरेपबेनस साटिवस ली
रंग: मूली का रंग सफेद होता है।
स्वाद: इसका स्वाद तीखा होता है।
स्वरूप: मूली गाजर की तरह जमीन के भीतर कन्दरूप में पैदा होती है। मूली के पत्ते नए सरसों के पत्तों के समान, फूल-सफेद सरसों के फूलों के आकार के और फल भी सरसों ही के समान परन्तु उससे कुछ मोटे होते हैं। इसके बीज सरसों से बड़े होते हैं। www.allayurvedic.org
स्वभाव: मूली की तासीर खाने में सर्द, गर्म (उष्ण) और ठंडी होती है। मूली के बीजों में उड़नशील तेल होता है। कन्द में आर्सेनिक 0.1 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम में रहता है। मूली तथा बीज में स्थिर तेल भी पाया जाता है। वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार मूली में प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फॉस्फोरस और आयरन है। इसमें विटामिन `ए´ `सी´ पोटैशियम और सूक्ष्म मात्रा में तांबा भी होता है।
हानिकारक: खाली पेट मूली खाने से छाती में दाह (जलन) होती है और पित्त उत्तेजित होता है। शरद ऋतु (सर्दी के मौसम में) में मूली का सेवन लाभदायक नहीं है। मूली खाकर ऊपर से दूध पीना नहीं चाहिए। रात को मूली नहीं खानी चाहिए।
गुण: मूली तिल्ली (प्लीहा) के रोगियों के लिए लाभदायक है। शीतकाल में मूली उत्तेजक, पाचन और पोषण करने वाली है। मूली के पत्ते या उसका रस सेवन करना लाभकारी है। अग्निमांद्य (भूख का कम लगना),अरुचिअफारा (पेट फूलना), स्त्रियों को मासिकस्राव में पीड़ा होना, पुरानी प्रमेह, पेशाब करने में कठिनाई (मूत्रकृच्छपथरी, हिचकी, सूजन, अपच, कफ-वात-ज्वर, श्वास (दमा), हिचकी और सूजन-इन समस्त रोगों में मूली लाभकारी है। पुरानी कब्ज में मूली का साग रोजाना खाने से लाभ होता है। मूली बुखारश्वास (दमा)नाक के रोग, गले के रोग और नेत्रों (आंखों) के रोगों को मिटाती है। मूली गैस, क्षय (टी.बी.)खांसी,नाभि का दर्द, कफ, वात, पित्त और रुधिर (खून) के रोगों को दूर करती है। इसके अतिरिक्त पेट के कीड़े,फुंसियांबवासीर और सभी प्रकार की सूजन में मूली उपयोगी है।

मूली में पाए जाने वाले तत्व:

तत्त्वमात्रातत्त्वमात्रा
प्रोटीन0.7  प्रतिशतअन्य खनिज पदार्थ0.6 प्रतिशत
वसा0.1  प्रतिशतकैल्शियम35 मिलीग्राम
कार्बोहाइड्रेट3.4  प्रतिशतफॉस्फोरस2.2 मिलीग्राम
पानी94.4  प्रतिशतलौह0.4 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम
विटामिन-बी कॉम्प,अल्प मात्रा मेंविटामिन-सी15 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम
रेशा0.8  प्रतिशत
विभिन्न रोगों में सहायक:
1. पेशाब के समय जलन व दर्द: आधा गिलास मूली के रस का सेवन करने से पेशाब के साथ होने वाली जलन और दर्द मिट जाता है।
2. पेशाब कम बनना: गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब का बनना बंद हो जाए तो मूली का रस 50 मिलीलीटर रोजाना पीने से, पेशाब फिर बनने लगता है।
3. पेट में दर्द:
  • 1 कप मूली के रस में नमक और मिर्च डालकर सेवन करने से पेट साफ हो जाता है और पेट का दर्द भी दूर हो जाता है।
  • मूली का लगभग 1 ग्राम के चौथे भाग के रस में आवश्यकतानुसार नमक और 3-4 कालीमिर्च का चूर्ण डालकर 3-4 बार रोगी को पिलाने से पेट के दर्द में लाभ मिलता है।
  • 10 मिलीलीटर मूली का रस, 10 ग्राम यवक्षार, 50 ग्राम हिंग्वाष्टक चूर्ण, 50 ग्राम सोडा बाइकार्बोनेट, 2 ग्राम नौसादर, 10 ग्राम टार्टरी को मिलाकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 3 ग्राम पानी के साथ खाने से हर प्रकार का पेट का दर्द दूर हो जाता है।
  • 100 मिलीलीटर मूली का रस, 200 ग्राम घीकुंवार का रस, 50 मिलीलीटर अदरक का रस, 20 ग्राम सुहागे का फूल, 20 ग्राम नौसादर ठीकरी, 20 ग्राम पांचों नमक, 10-10 ग्राम चित्रकमूल, भुनी हींग, पीपल मूल, सोंठ, कालीमिर्च, पीपल, भुना जीरा, अजवाइन, लौह भस्म और 150 ग्राम पुराना गुड़। सभी औषधियों को पीसकर चूर्ण बनाकर मूली, घीकुंवार और अदरक के रस में मिलाकर, अमृतबान (एक बर्तन) में भरकर, अमृतबान का मुंह बंद करके 15 दिन धूप में रखें। 15 दिन बाद इसे छानकर बोतल में भर लें, आवश्यकतानुसार इस मिश्रण को 6-10 ग्राम तक लगभग 30 मिलीलीटर  पानी में मिलाकर भोजन के बाद सेवन करने से पाण्डु (पीलिया), मंदाग्नि (पाचन क्रिया खराब होना), अजीर्ण (भूख न लगना), आध्यमान, कब्ज और पेट में दर्द आदि पेट से सम्बंधित रोग दूर हो जाते हैं। मासिक-धर्म के कष्ट के साथ आता हो या अनियमित हो तो इस मिश्रण को 2 चाय वाले चम्मच-भर सुबह-शाम 3 सप्ताह तक नियमित रूप से सेवन करना लाभदायक है।
  • मूली के रस में कालीमिर्च और 1 चुटकी काला नमक मिलाकर खाने से लाभ होता है।
  • मूली के रस में काला या सेंधानमक मिलाकर प्रयोग करने से पेट की पीड़ा में राहत मिलती है।
  • मूली की राख, करेला का रस, साण्डे की जड़ का रस, गडतूम्बा का रस को 10-10 ग्राम की मात्रा में मिलाकर रख लें। इस मिश्रण को दिन में 3 बार पीने से पीलिया, मधुमेह (डाइबिटीज), पेट का दर्द, पथरी, औरतों के वायु गोला (औरतों के पेट में गैस का गोला होना), शरीर का मोटापा, गुल्म वायु (पेट में कब्ज के कारण रूकी हुई वायु या गैस) तथा अजीर्ण आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
  • 20 से 40 मिलीलीटर मूली के पत्तों का रस सुबह-शाम सेवन करने से पेट के दर्द में आराम होता है।
  • मूली के रस में नींबू का रस और सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से वायु विकार (गैस रोग) से उत्पन्न पेट दर्द समाप्त हो जाता है।
4. हिचकी:
  • मूली का जूस पीयें। सूखी मूली का काढ़ा 50 से 100 मिलीलीटर तक 1-1 घंटे पर पिलायें।
  • मूली के कोमल पत्ते चबाकर रस चूसने से हिचकी तुरन्त बंद हो जाती है। मूली का रस हल्का-सा गर्म करके पीने से भी हिचकी बंद हो जाती है। www.allayurvedic.org
5. मधुमेह (डायबिटिज):
  • मूली खाने से या इसका रस पीने से मधुमेह (डायबिटीज) में लाभ होता है।
  • आधी मूली का रस दोपहर के समय मधुमेह (डायबिटीज) के रोगी को देने से लाभ होता है।
6. पीलिया (कामलापाण्डु):
  • एक कच्ची मूली रोजाना सुबह सोकर उठने के बाद ही खाते रहने से कुछ ही दिनों में ही पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • 125 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस में 30 ग्राम चीनी मिलाकर सुबह के समय रोगी को पिलाएं, इसे पीते ही लाभ होगा और 1 सप्ताह में रोगी को आराम मिल जाएगा।
  • मूली में विटामिन `सी´, लौह, कैल्शियम, सोडियम, मैग्नेशियम और क्लोरीन आदि कई खनिज लवण होते हैं, जो लीवर (जिगर) की क्रिया को ठीक करते हैं। अत: पाण्डु (पीलिया) रोग में मूली का रस 100 से 150 मिलीलीटर की मात्रा में गुड़ के साथ दिन में 3 से 4 बार पीने से लाभ होता है।
  • मूली का रस 10-15 मिलीलीटर 1 उबाल आने तक पकाएं। बाद में उतारकर 25 ग्राम खांड या मिश्री मिलाकर पिलाएं, साथ ही मूली और मूली का साग खिलाते रहने से पीलिया ठीक हो जाता है।
  • सिरके में बने मूली के अचार के सेवन से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • लगभग आधा से 1 ग्राम मण्डूरभस्म, लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लौह भस्म को शहद के साथ रोगी को चटायें। फिर ऊपर से 100 मिलीलीटर मूली के रस में चीनी मिलाकर पिलायें। इसे रोजाना सुबह-शाम पिलाने से 15-20 दिनों में पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • मूली के ताजे पत्तों को पानी के साथ पीसकर उबाल लें इसमें दूध की भांति झाग ऊपर आ जाता है, इसको छानकर दिन में 3 बार पीने से कामला (पीलिया) रोग मिट जाता है।
  • पत्तों सहित मूली का रस निकाल लें, फिर दिन में 3 बार 20-20 ग्राम की मात्रा में पीने से पीलिया रोग में लाभ होता हैं।
  • 70 मिलीलीटर मूली के रस में 40 ग्राम शक्कर (चीनी) मिलाकर पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • 60 मिलीलीटर मूली के पत्ते का रस व 15 ग्राम खांड मिलाकर पीने से पीलिया रोग में आराम आता है।
  • मूली की सब्जी का सेवन करने से पीलिया रोग मिट जाता है।
  • मूली के 100 मिलीलीटर रस में 20 ग्राम शक्कर मिलाकर पीने से पीलिया रोग मिट जाता है। रोगी को मूली, संतरा पपीता, खरबूज, अंगूर और गन्ना आदि खाने को देना चाहिए।
  • मूली के पत्तों का 80 मिलीलीटर रस निकालकर किसी बर्तन में आग पर चढ़ा दें, जब पानी उबल जाए, तब उसे छानकर उसमें शक्कर मिलाकर खाली पेट पीने से पीलिया रोग मिट जाता है।
  • 25 मिलीलीटर मूली के रस में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग पिसा हुआ नौसादर मिलाकर सुबह-शाम लेने से पीलिया रोग दूर हो जाता है।
  • 1 चम्मच कच्ची मूली का रस तथा उसमें 1 चुटकी जवाखार मिलाकर सेवन करें। कुछ दिनों तक सुबह, दोपहर और शाम को लगातार पीने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
  • मूली के पत्तों के 100 मिलीलीटर रस में शर्करा मिलाकर सुबह के समय पीने से पीलिया रोग में लाभ होता है। सुबह मूली खाने या इसका रस पीने से भी पीलिया रोग नष्ट होता है।
  • पीलिया के रोगी को गन्ने के रस के साथ मूली के रस का भी सेवन करना चाहिए, मूली के पत्तों की बिना चिकनाई वाली भुजिया खानी चाहिए।
7. आंतों के रोगमूली का रस आंतों में एण्टीसैप्टिक का कार्य करता हैं।
8. पथरी:
  • 30 से 35 ग्राम मूली के बीजों को आधा लीटर पानी में उबाल लें। जब पानी आधा शेष रह जाए तब इसे छानकर पीएं। यह प्रयोग कुछ दिनों तक करने से मूत्राशय की पथरी चूर-चूर होकर पेशाब के साथ बाहर आ जाएगी। यह प्रयोग 2 से 3 महीने निरन्तर जारी रखें। मूली का रस पीने से पित्ताशय की पथरी बनना बंद हो जाती है।
  • मूली का 20 मिलीलीटर रस हर 4 घंटे में 3 बार रोजाना पीएं तथा इसके पत्ते चबा-चबाकर खाएं। इससे मूत्राशय की पथरी चूर-चूर होकर पेशाब के साथ बाहर आ जायेगी। यह प्रयोग 2-3 महीने करें। मूली का रस पीने से पित्ताशय की पथरी (गेल स्टोन) बनना बंद हो जाती है।
  • 80 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस में 30 ग्राम अजमोद मिलाकर रोजाना पीने से पथरी गलकर निकल जाती है।
  • मूली में गड्ढ़ा कर उसमें शलगम के बीज डालकर गुन्था आटा ऊपर लपेटकर अंगारों पर सेंक लें, जब भरता हो जाये या पक जाये तब निकालकर आटे को अलग करके मूली को खा लें। इससे पथरी के टुकड़े-टुकड़े होकर निकल जाती है।
  • मूली का रस निकालकर उसमें जौखार का चूर्ण (पाउडर) आधा ग्राम मिलाकर रोजाना सुबह-शाम खायें। इससे पेडू (नाभि के नीचे का हिस्सा) का दर्द और गैस दूर होती है तथा पथरी गल जाती है।
  • मूली के पत्तों के रस में शोरा डालकर सेवन करने से पथरी मिटती है।
  • एक गिलास पानी रात को सोते समय रखें। सुबह उस पानी में 2 ग्राम मूली का रस डालकर पीयें। इसको पीने से पथरी गलकर निकल जाती है।
9. कामेन्द्रिय (लिंग) का शिथिल (ढीला) हो जाना:मूली के बीजों को तेल में पकाकर (औटाकर) उस तेल से कामेन्द्रिय पर मालिश करें। इससे कामेन्द्रिय की शिथिलता (ढीलापन) दूर होकर उसमें उत्तेजना पैदा होती है।
10. मासिक-धर्म की रुकावटअनियमितता व परेशानियां:
  • मूली के बीजों के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में स्त्री को देने से मासिक-धर्म की रुकावट दूर होती है और मासिक-धर्म साफ होता है।
  • 2-2 ग्राम मूली के बीज, गाजर के बीज, नागरमोथा और हथेली भर नीम की छाल को पीस-छानकर गर्म पानी के साथ सेवन करें। इसके सेवन के बाद में दूध का सेवन करना चाहिए। इससे बंद मासिकस्राव (रजोदर्शन) शुरू हो जाता है।
  • मासिक-धर्म (ऋतुस्राव) के रुकने के कारण चेहरे पर अधिक मुंहासे निकलते हों तो सुबह के समय मूली और उसके कोमल पत्ते चबाकर खाने से आराम मिलता है। मूली के रस का भी सेवन कर सकते हैं।
  • मूली, गाजर तथा मेथी के बीज 50-50 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण तैयार कर लें। इस मिश्रण को 10 ग्राम लेकर पानी के साथ सेवन करने से मासिक-धर्म सम्बन्धी शिकायतें दूर हो जाती हैं।
  • 3 ग्राम मूली के बीजों का चूर्ण सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से ऋतुस्राव (मासिक-धर्म का आना) का अवरोध नष्ट होता है।
11. बवासीर:
  • मूली कच्ची खाएं तथा इसके पत्तों की सब्जी बनाकर खाएं। कच्ची मूली खाने से बवासीर से गिरने वाला रक्त (खून) बंद हो जाता है। बवासीर खूनी हो या बादी 1 कप मूली का रस लें। इसमें एक चम्मच देशी घी मिला लें। इसे रोजाना दिन में 2 बार सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।
  • कोमल मूली के 40-60 मिलीलीटर बने काढ़े (क्वाथ) में 1-2 ग्राम पीपर का चूर्ण मिलाकर पीने से बवासीर में आराम आता है।
  • एक सफेद मूली को काटकर नमक लगाकर रात को ओस में रख दें। इसे सुबह खाली पेट खाएं। मलत्याग के बाद गुदा भी मूली के पानी से धोएं या 125 मिलीलीटर मूली के रस में 100 ग्राम देशी घी की जलेबी एक घंटा भीगने दें। उसके तुरन्त बाद जलेबी खाकर पानी पी लें। इस प्रकार निरन्तर एक सप्ताह यह प्रयोग करने से जीवन भर के लिए प्रत्येक प्रकार की बवासीर ठीक हो जाएगी।
  • मूली के टुकड़े को घी में तलकर चीनी के साथ खाएं या मूली काटकर उस पर चीनी डालकर रोजाना 2 महीने तक खाने से भी बवासीर में लाभ होता है।
  • सूखी मूली की पोटली गर्म करके बवासीर के मस्सों पर सिंकाई करने से आराम आता है।
  • सूरन के चूर्ण को घी में भूनकर, मूली के रस में घोंटकर 1-1 ग्राम की गोलियां बना लें। फिर रोजाना सुबह-शाम 1-1 गोली ताजे पानी के साथ लेने से हर प्रकार की बवासीर नष्ट होती है।
  • रसौत और कलमी शोरा दोनों को बराबर लेकर, मूली के रस में घोटकर चने के बराबर गोलियां बना लें। रोजाना सुबह-शाम 1 से 4 गोली बासी पानी के साथ खाने से दोनों प्रकार की बवासीर नष्ट हो जाती है।
  • 10-10 ग्राम नीम की निंबौली, कलमी शोरा, रसावत और हरड़ को लेकर बारीक पीस लें, फिर इसे मूली के रस में मिलाकर जंगली बेर के बराबर आकार की गोलियां बना लें। रोजाना सुबह-शाम 1-1 गोली ताजे पानी या मट्ठा के साथ खाने से खूनी बवासीर से खून आना पहले ही दिन बंद हो जाता है और बादी बवासीर 1 महीने के प्रयोग से पूरी तरह नष्ट हो जाती है।
  • मूली की जड़ को चाकू या छुरी से गोल-गोल चकतियां बनाकर घी में तलकर मिश्री के साथ खाने से बवासीर में बहुत लाभ होता है।
  • मूली के रस में नीम की निंबौली की गिरी पीसकर कपूर मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लेप करने से मस्से सूख जाते हैं।
  • एक अच्छी मोटी मूली लेकर ऊपर की ओर से काटकर चाकू या छुरी से उसे खोखली करके उसमें 20 ग्राम `रसवत´ भरकर मूली के कटे हुए भाग का मुंह बंदकर कपड़े और मिट्टी से अच्छी तरह बंद कर दें। इसे कण्डों की आग में रखकर राख बना लें। दूसरे दिन रसवत निकालकर मूली के रस में खरल (कूट) कर झड़बेरी के बराबर गोलियां बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम ताजे पानी के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर कुछ ही दिनों में ठीक हो जाती है।
  • मूली के पत्तों को छाया में सुखाकर बारीक पीस लें, फिर इसमें इसी के समान मात्रा में चीनी, मिश्री या खांड मिलाकर रोजाना बासी मुंह 10 ग्राम की मात्रा में खाने से बवासीर में आराम हो जाता है।
  • मूली की सब्जी बनाकर खाने से बवासीर और पेट दर्द में आराम मिलता है।
  • बवासीर में सूखी मूली का 20-50 मिलीलीटर सूप, पानी अथवा बकरी के मांस के सूप में मिलाकर पीने से बवासीर के रोग में आराम आता है।
  • 125 मिलीलीटर मूली के रस में 100 ग्राम जलेबी को मिलाकर एक घंटे तक रखें। एक घंटे बाद जलेबी को खाकर रस को पी लें। इसको पीने से 1 सप्ताह में ही बवासीर का रोग ठीक हो जाता है।
  • मूली के छोटे-छोटे टुकड़े करके उसे देशी घी में तलकर रोजाना सुबह-शाम खाने से दोनों प्रकार की बवासीर ठीक हो जाती हैं।
  • सूखे हुए मूली के पत्तों का चूर्ण बनाकर उसमें मिश्री मिलाकर प्रतिदिन खाने से बवासीर ठीक होता है।
  • मूली का रस निकालकर इसके 20 मिलीलीटर रस में 5 ग्राम घी मिलाकर रोजाना सुबह-शाम पीने से खून का निकलना बंद हो जाता है।
12. बिच्छू के काटने पर: मूली के टुकड़े पर नमक लगाकर बिच्छू के काटे स्थान पर रखने से दर्द शांत होता है। बिच्छू के काटे रोगी को मूली खिलाएं और पीड़ित स्थान पर भी मूली का रस लगाने से लाभ होता है।
13. दाद:
  • मूली के बीजों को नींबू के रस में पीसकर गर्म करके दाद पर लगाएं। पहले दिन लगाने पर जलन व दर्द होगा, दूसरे दिन यह दर्द कम होगा। ठीक होने पर कोई कष्ट नहीं होगा। यह प्रयोग सूखी या गीली दोनों प्रकार के दाद में लाभदायक है।
  • मूली के बीजों को नींबू के रस में पीसकर लगाने से दाद में लाभ होता है।
  • शरीफे के फलों के रस में मूली के बीज को पीसकर लगाने से दाद का रोग ठीक हो जाता है।
14. गले के घाव: मूली का रस और पानी बराबर मात्रा में मिलाकर नमक डालकर गरारे करने से गले के घाव ठीक हो जाते हैं।
15. अग्निमान्द्य (भूख का कम लगना), अरुचि, पुरानी कब्ज, गैस: भोजन के साथ मूली पर नमक, कालीमिर्च डालकर 2 महीने रोजाना खाएं। पेट के रोगों में मूली की चटनी, अचार व सब्जी खाना भी उपयोगी है।
16. अम्लपित्त (एसिडिटीज):
  • यदि गर्मी के प्रभाव से खट्ठी डकारें आती हो तो 1 कप मूली के रस में मिश्री मिलाकर सेवन करना लाभकारी होता है।
  • 100 मिलीलीटर मूली के रस में 10 मिलीलीटर आंवले का रस या 3 ग्राम आंवले का चूर्ण मिलाकर सुबह, दोपहर और शाम को सेवन करने से अम्लपित्त (एसिडिटिज) मे बहुत लाभ होता है।
  • मूली का रस और कच्चे नारियल के पानी को मिलाकर 250 मिलीलीटर की मात्रा में दिन भर में सेवन करने से अम्लपित्त (एसिडिटीज) में काफी आराम आता है।
  • कोमल मूली को मिश्री मिलाकर खायें या इसके पत्तों के 10-20 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर रोजाना सेवन करने से अम्लपित्त (एसिडिटीज) का रोग कम हो जाता है।
  • मूली के रस में चीनी मिलाकर सेवन करने से पेट की जलन, गर्मी और खट्टी डकारें आना बंद हो जाती हैं।
  • 2 चम्मच मूली के रस में थोड़ी-सी मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से खट्टी डकारों से छुटकारा मिल जाता है।
  • मूली को काटकर सेंधानमक लगाकर खाली पेट सुबह के वक्त खाने से लाभ होता है, ध्यान रहें कि खांसी की शिकायत हो, तो मूली का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए क्योंकि यह उस समय हानिकारक होगी।
17. गन्धनाशक (दुर्गन्ध को रोकने वाला): मूली खाने के बाद गुड़ खाने से डकार में मूली की गन्ध नहीं आती है।
18. कान का दर्द:
  • मूली के पत्तों को पीसकर उसका रस निकाल लें। इसके 50 मिलीलीटर रस को मिलीलीटर ग्राम तिल के तेल में काफी देर तक पका लें। पकने पर रस पूरी तरह से जल जाये तो उस तेल को कपड़े में छानकर शीशी में भरकर रख लें। कान में दर्द होने पर इस तेल को गुनगुना करके कान में डालने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।
  • 2 से 4 बूंद मूली की जड़ों का रस गर्म करके कान में 2 से 3 बार डालें। www.allayurvedic.org
19. बच्चे की यकृत-प्लीहा-वृ़द्धि: 3 से 6 मिलीलीटर मूली का ताजा रस यवक्षार तथा शहद के साथ दिन में 2 बार बच्चे को देने से जिगर, प्लीहा (तिल्ली) बढ़ना कम हो जाता है।
20. शीतपित्तमूली के जूस का सेवन करने से शीतपित्त रोग ठीक हो जाता है।
21. कुष्ठ रोग: मूली के बीजों को चिरचिटा के रस में पीसकर लेप करने से कुष्ठ (कोढ़) के रोग में आराम आता है।
22. अरुचि: ताजी मुलायम मूलियों को जड़ पत्ते सहित काटकर, उसमें अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े और नींबू का रस तथा सेंधानमक मिलाकर भोजन से पहले और भोजन के साथ खाने से अरुचि (भोजन करने का मन न करना) की शिकायत दूर हो जाती है।
23. अजीर्ण (पुरानी कब्जअपच):
  • मूली के ताजे मुलायम पत्तों को काटकर, उसमें बारीक अदरक काटकर डालें, ऊपर से नींबू का रस निचोड़े और नमक डालकर खायें। इससे अजीर्ण (पुरानी कब्ज, भूख न लगना) का रोग दूर हो जाता है।
  • 100 मिलीलीटर मूली के पत्तों का रस और 10-10 ग्राम नींबू और अदरक के रस में स्वादानुसार सेंधानमक मिलाकर पीने से अजीर्ण रोग मिट जाता है।
24. अफारा: (अजीर्ण, मंदाग्नि या अतिसार के कारण पेट में गैस भरकर जब पेट फूल जाता है तो यही अफारा कहलाता है)
  • 50 से 100 मिलीलीटर मूली के रस को गर्म करके इसमें 1 ग्राम अजवाइन और चुटकीभर कालानमक या सेंधानमक मिलाकर पीने से पेट में रुकी गैस निकल जाती है।
  • 1 ग्राम मूली क्षार को गर्म पानी से सेवन करने से अफारा (पेट की रुकी हुई गैस) में आराम मिलता है।
  • 20 से 40 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस को सुबह-शाम रोगी को देने से पेट की गैस की शिकायत चली जाती है।
25. कब्ज:
  • मूली व उसके पत्तों को काटकर, उसमें प्याज, खीरा या ककड़ी और टमाटर कुतरकर मिला लें। इस प्रकार तैयार हुए सलाद में 5-10 बूंद सरसों का तेल भी मिला सकते हैं। भोजन के साथ रोजाना इस प्रकार तैयार किया हुआ सलाद जो पूरे भोजन का एक तिहाई ही होता है, को खाने से कब्ज दूर होती है।
  • मूली का साग या ताजी मुलायम मूलियों को पत्तों सहित खाने या मूली का अचार खाने से कब्ज मिट जाती है।
  • मूली पर नमक, कालीमिर्च डालकर खाना खाते समय रोजाना दो महीने तक खाने से कब्ज दूर हो जाती है।
  • मूली के पत्तों का रस 20 से 40 मिलीलीटर तक खुराक के रूप में सुबह-शाम सेवन करने से दस्त साफ आते हैं और पेशाब खुलकर आता है।
  • मूली के बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से कब्ज में लाभ होता है।
26. आंत्रव्रण (अल्सर): कठिन कब्ज होने से या कोई तीक्ष्णदाहक (तेज जलनयुक्त) वस्तु खा लेने से आंतों में व्रण (घाव) हो जाता है। इसे अंग्रेजी में अल्सर कहते हैं। इसके लिए 100 मिलीलीटर मीठी मूलियों का रस दिन में 2-3 बार सेवन करने से अल्सर में लाभ होता है।
27. अजीर्ण हैजा: 1 से 2 छोटी मूलियां जड़-पत्तों सहित कुचलकर लगभग 470 मिलीलीटर पानी में पकाकर उसका चौथा भाग शेष रह जाने पर 1 ग्राम पीपल का चूर्ण मिलाकर 1-1 घंटे के अन्तर से पिलाने से अजीर्ण हैजा में आराम हो जाता है।
28. यकृत (जिगर) की कमजोरी: 1 ग्राम मूली के रस को छाछ (मट्ठे) के साथ और शाम के समय ताजे पानी के साथ लेने से जिगर की कमजोरी दूर होती है और वह अपना काम अच्छी तरह से करने लगता है।
29. यकृत शोथ (सूजन): 25 मिलीलीटर मूली के रस और मकोय के रस को मिलाकर इसमें 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण मिलाकर रोगी को पिलाने से यकृत (जिगर) की सूजन ठीक हो जाती है।
30. यकृत वृद्धि: 50 मिलीलीटर मूली के रस में 10 मिलीलीटर घीक्वार का रस मिलाकर पिलाने से यकृत वृद्धि (जिगर का बढ़ना) दूर हो जाती है।
31. तिल्ली का बढ़ना (प्लीहा वृद्धि): मूली के जड़ों को छोटे-छोटे टुकड़े में काटकर उसे सिरका में डालकर उसमें आवश्यकतानुसार भुना जीरा, नमक और कालीमिर्च मिलाकर 1 सप्ताह धूप में रखकर अचार बना लें। रोजाना सुबह 25 ग्राम इस अचार को खाने से प्लीहा वृद्वि (तिल्ली का बढ़ना) दूर हो जाती है।
32. श्वास (दमा):
  • 40-40 ग्राम रसवत और कलमी शोरा लेकर 1 बोतल मूली के रस में पीसकर सूखी करके बेर के बराबर आकार की गोलियां बनाकर सुखा लें। सुबह-शाम 2 से 3 गोली ताजे पानी के साथ सेवन करने से श्वास (दमा) और खांसी में बहुत लाभ होता है।
  • 20 ग्राम सूखी मूली को पीसकर लगभग 470 मिलीलीटर पानी में उबालें, जब यह एक चौथाई शेष बचे तो इसे पीने से श्वास (दमा) में निश्चित रूप से फायदा होता है।
  • मूली के छोटे-छोटे टुकड़े करके किसी कलईदार बर्तन में या स्टेनलेस स्टील के बर्तन में भरकर, उसमें इतना शहद डालें कि मूली के टुकड़े शहद में डूब जाएं। फिर बर्तन के मुंह को ढक्कन से बंदकर, उसकी संधियों को उड़द के आटे से बंद कर 10-12 घंटे रखने के बाद निकालकर मूली के टुकड़ों को खूब मसलकर शहद में मिश्रित कर लें। रोजाना 20 से 30 ग्राम की मात्रा इस मिश्रिण का सेवन करने से श्वास (दमा) के रोग में निश्चित रूप में लाभ मिलता है।
  • मूली का लगभग आधा ग्राम से 2 ग्राम रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 3 से 4 बार चाटने से श्वास (दमा) रोग में आराम होता है।
33. शोथ (सूजन):
  • काले तिलों के साथ मूली का सेवन करने से सभी प्रकार की सूजन में लाभ होता है।
  • सूखी मूली को जलाकर राख बना लें। इसे सरसों के तेल में मिलाकर सूजन वाले स्थान पर लेप करने से सूजन दूर होती है।
  • 5 ग्राम तिलों के साथ मूली के 1 से 2 ग्राम बीजों का सेवन दिन में 2 से 3 बार प्रयोग करने से सभी प्रकार की सूजन मिट जाती है।
  • मूली और तिल खाने से त्वचा के नीचे जमा पानी सूख जाता है और सूजन मिट जाती है। मूली के पत्तों का 2 से 50 मिलीलीटर रस रोगी को पिलाने से भी सूजन जल्दी से उतरती है।
34. लकवामूली का 20 से 40 मिलीलीटर तेल लकवा रोग में दिन में 3 बार पीने से लाभ होता है।
35. ग्रंथि विसर्प में: सूखी मूली की लुगदी को कुछ गर्म करके लेप करने से ग्रंथि विसर्प के रोग में आराम आता है।
36. सिध्म कुष्ठ (कोढ़): मूली के 10-20 ग्राम बीज बहेड़ा के पत्तों के रस में पीसकर शरीर में कोढ़ वाले स्थान पर लगाने से लाभ होता है।
37. गठिया वात (जोड़ों का दर्द): मूली के रस में 10-12 बूंद लहसुन का रस मिलाकर दिन में 2-3 बार रोगी को पिलाने से जोड़ों के दर्द में लाभ होता है।
38. मोटापा दूर करना:
  • मूली के 100-150 मिलीलीटर रस में नींबू का रस मिलाकर दिन में 2 से 3 बार पीने से मोटापा कम होता है।
  • 6 ग्राम मूली के बीजों के चूर्ण को 1 ग्राम यवक्षार के साथ खाकर ऊपर से शहद और नींबू का रस मिला हुआ एक गिलास पानी पीने से शरीर की चर्बी घटती है।
  • 6 ग्राम मूली के बीजों के चूर्ण को 20 ग्राम शहद में मिलाकर खा लें, फिर ऊपर से लगभग 20 ग्राम शहद मिलाकर बनी शर्बत बनाकर 40 दिनों तक पीने से मोटापा कम होता है।
  • मूली के चूर्ण को रोजाना शहद या शर्बत के साथ पीने से मोटापा कम हो जाता है।
  • 3 से 6 ग्राम मूली के चूर्ण को शहद मिले पानी में मिलाकर सुबह-शाम पीने से मोटापे की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
39. पेशाब में धातु का आना (मू़त्राघात):
  • 4 ग्राम मूली के बीज सिल पर बारीक पीसकर 300 से 400 मिलीलीटर पानी में मिलाकर छान लें। इसे रोगी को पिलाने से मूत्र (पेशाब) की जलन दूर होकर पेशाब सरलता से खुलकर आता है।
  • पेशाब में धातु का आना (मूत्राघात) रोग में मूली खाने से लाभ होता है।
  • मूली को पीसकर थोड़ा-सा कलमी शोरा मिलाकर पेडू (नाभि) पर लेप करने से रुका हुआ पेशाब खुलकर आता है और पेशाब के साथ धातु का आना बंद होता है।
40. मूत्रदाह (पेशाब में जलन): कोई तीखी जलनयुक्त पदार्थ खा लेने या गर्मी के कारण जलन और दर्द के साथ बूंद-बूंद पेशाब आने की अवस्था में कालीमिर्च और नमकयुक्त मूली का अचार खाने से और मूली पीसकर 1 ग्राम कलमी शोरा मिलाकर पेडू पर लेप करने से मूत्रदाह (पेशाब करने में परेशानी) का रोग दूर हो जाता है।
41. सुजाक:
  • स्वर्णक्षीरी (पीले फूल, पत्तों और कांटे वाली एक औषधि जो सितम्बर-अक्टूबर से मई-जून तक अक्सर हमेशा पाई जाती है, इसे सत्यानाशी भी कहते हैं) की जड़ की छाल को 6 ग्राम से 10 ग्राम तक पीसकर 250 मिलीलीटर मूली के रस के साथ पीने से सुजाक रोग में लाभ होता है।
  • 30-40 ग्राम वनज की 1 मूली की 4 फांकें करके उन पर 1 ग्राम फुलाई हुई फिटकरी का बारीक चूर्ण छिड़कें, फिर उसे रात को ओस में रख दें। सुबह उन मूलियों को खाकर, उनका निकला हुआ पानी पीने से सुजाक की जलन कड़क और पीव आना बंद हो जाती है।
  • मूली की 4 फांके करके उन पर भूनी फिटकरी का चूर्ण 6 ग्राम छिड़ककर रात में ओस में रख दें। सुबह ये फांके खाकर ऊपर से जो पानी निकला है, इसे पी लें। इससे सुजाक रोग में लाभ होता है और पथरी गलकर निकल जाती है।
42. कामोद्वीपक (कामोत्तेजक) तेल: 200 मिलीलीटर शुद्ध तिल के तेल में 50 ग्राम मूली के बीज को बारीक पीसकर मिला दें और कड़ाही में डालकर पकाएं। पकते-पकते जब तेल चौथाई हिस्सा बाकी रह जाए तो इसे उतारकर ठण्डा होने पर छानकर शीशी में रख लें। रोजाना रात को लिंगेन्द्रिय में इस तेल की मालिश करने से इन्द्रिय की समस्त बिमारियां और कमजोरी दूर होकर इन्द्रिय मजबूत होती है तथा उसमें असमय काम शक्ति वेग उत्पन्न होता है।
43. कर्णविकार (कान के रोग):
  • मूली के पानी को तिल के तेल में जलाकर कान में 2-2 बूंद डालने से कान के दर्द में आराम मिलता है।
  • 3 ग्राम मूली का रस और 20 ग्राम शहद को मिलाकर इसमें बत्ती भिगोकर कान में रखें। इससे कान से पीव (मवाद) का आना बंद हो जाता है।
  • मूली के पत्तों का 30 मिलीलीटर तेल लें, फिर इसकी 2 से 4 बूंदे कान में टपकाने से कान की पीड़ा मिट जाती है।
44. आंख का जाला: मूली का पानी आंखों में डालने से आंख का जाला व धुंध दूर हो जाता है।
45. पाचन: मूली का प्रयोग भोजन से पहले नहीं करना चाहिए क्योंकि यह पाचन में भारी है और भोजन के बाद खाने से भोजन को पचाती है। www.allayurvedic.org
46. यकृत, प्लीहा रोग: मूली के 4 टुकड़े करके चीनी मिट्टी के बर्तन रखे, फिर इसमें 6 ग्राम पिसा नौसादर छिड़ककर रात को ओस में रख दें। सुबह जो पानी निकले उसको पीकर ऊपर से मूली की फांके खा लें, ऐसा करने से 7 दिनों में यकृत (जिगर), प्लीहा (तिल्ली) का रोग कट जाता है।
47. खूनी बवासीर (रक्त अर्श):
  • मूली के कन्दों का ऊपर का सफेद मोटा छिलका उतारकर तथा पत्तों को अलगकर रस निकाल लें, इसमें 6 ग्राम घी मिलाकर रोजाना सुबह-सुबह सेवन करने से खूनी बवासीर दूर हो जाती है।
  • 10 ग्राम फिटकरी को 1 लीटर मूली के रस में उबाल लें इसके गाढ़ा होने पर बेर के समान गोलियां बना लें। एक गोली मक्खन के साथ खाकर 125 ग्राम दही पिलाएं। इससे खूनी बवासीर में आराम मिलता है।
48. वृक्क (गुर्दे) विकार:
  • गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बंद हो जाये तो मूली का 20-40 मिलीलीटर रस दिन में 2 से 3 बार पीने से पेशाब फिर से बनने लगता है।
  • मूली के पत्तों के 10 से 20 मिलीलीटर रस में 1-2 ग्राम कलमीशोरा का रस मिलाकर रोगी को पिलाने से पेशाब साफ आता है।
  • गुर्दे के दर्द में 10 ग्राम कलमीशोरा को 120 मिलीलीटर मूली के रस में घोंटकर रस सुखा दें। फिर इसकी गोलियां बनाकर 1-2 गोली दिन में 2 बार सेवन करने से मूत्राघात (पेशाब में धातु का आना) दूर हो जाता है।
49. पाचनशक्तिवर्द्धक:
  • कोमल मूली के काढ़े में पीपर का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से पाचनशक्ति बढ़ती है और अपच (भोजन न पचना) या दस्त को बंद कर देता है।
  • पेट में जलन हो, अफारा (गैस) पीड़ित करता हो, खट्टी डकारें आती हो, अम्ल और पित्त का जोर हो तो मूली का सेवन करना चाहिए। मूली पाचन शक्ति बढ़ाती है और बदहजमी दूर करती है।
  • भोजन के साथ मूली और नींबू के रस से बना सलाद खाने से पाचन क्रिया (भोजन पचाने की क्रिया) तेज होती है।
50. पेशाब में अवरोधमूली के पत्तों के रस में सोड़ा बाईकार्ब मिलाकर पीने से पेशाब साफ आता है और मूत्रावरोध (पेशाब में अवरोध) दूर होती है।
51. पित्त विकार:
  • मूली के पत्तों के रस का सेवन करने से पित्त विकार नष्ट होते हैं।
  • सुबह बिना कुछ खाये मूली का सेवन करने से दूषित पित्त बाहर निकल जाती है।
52. उल्टी: अजीर्ण रोग के कारण उल्टी आने पर मूली के रस में पीपर का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से उल्टी बंद हो जाती है।
53. जलने पर: जले हुए अंग पर मूली को पीसकर लगाने से जलन तो शांत होगी ही, घाव में पानी भी नहीं भरेगा।
54. आंतों के कीडे़ और सूजन:
  • 50 ग्राम मूली के रस में सेंधानमक और कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर रोजाना सुबह-शाम पीने से आंत्रकृमि (आंत के कीड़े) नष्ट होते हैं।
  • आंतों के घाव भरने में मूली लाभप्रद है। मूली आंतों से कीड़े निकालकर पीड़ा से भी छुटकारा दिलाती है।
  • मूली और उसके कोमल पत्ते चबाकर खाने से आंत्रों (आंतों) की सूजन नष्ट होती है।
55. आंखों के रोहे, फूले: मूली का पानी (कन्द का रस) आंखों में 1 से 2 बूंद रोजाना 2-3 बार डालने से आंखों का जाला (आंखो में कीचड़), फूले, धुंध (धुंधला दिखाई देना) आदि रोग दूर हो जाते हैं।
56. दमा और हिचकी: सूखी मूली को उबालकर उसका पानी पीने से श्वास (दमा) और हिचकी रोग दूर हो जाता है।
57. बालों का बढ़ना: आधी से 1 मूली रोजाना दोपहर में खाना-खाने के बाद, कालीमिर्च के साथ नमक लगाकर खाने से बालों का रंग साफ होते है और बाल लम्बे भी हो जाते हैं। इसका प्रयोग 3-4 महीने तक लगातार करें। 1 महीने तक इसका सेवन करने से कब्ज, अफारा और अरुचि (भोजन करने का मन न करना) में आराम मिलता है। अपने लिए फायदेमंद होने पर ही इसका प्रयोग चालू रखें। ध्यान रहे मूली जिसके लिए फायदेमंद हो उन्हें ही इसका प्रयोग करना चाहिए।
58. खांसी: बच्चों को जब श्वास (सांस का रोग) या दमा हो जाए या पसली चलने लगे तो मूली के बीज और काकड़ासिंगी को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लेकर घी और शहद के साथ मिलाकर बच्चे को चटाने से खांसी में लाभ मिलता है।
59. आमाशय (पेट) का जख्म: मूली के रस में नमक मिलाकर पीने से भी आमाशय में लाभ होता है।
60. पेट की गैस बनना:
  • मूली और नमक को मिलाकर चटनी बना लें। इस चटनी को खाने से या कच्ची मूली का अचार खाने से गैस, अग्निमान्द्य (भोजन का न पचना), अरुचि (भोजन का अच्छा न लगना) और पुरानी कब्ज में आराम देता है।
  • मूली के रस में नींबू का रस मिलाकर पीने से भोजन के बाद पेट में होने वाला दर्द और गैस दूर हो जाती है।
  • भोजन के साथ मूली पर नमक, कालीमिर्च डालकर 2 महीने तक रोजाना खाने से पेट की गैस में आराम मिलता है।
61. गर्भपात: 1 से 3 ग्राम मूली के बीजों को सुबह-शाम सेवन करने से आर्तव (मासिक स्राव) जारी होता है। अत: गर्भपातक औषधियों जैसे गाजर के बीज के चूर्ण के साथ या क्वाथ (काढ़ा) में इसे भी साथ-साथ दिया जा सकता है।
62. मूत्ररोग: मूली के 20 मिलीलीटर रस में 4 ग्राम जवाखार मिला लें और रोजाना सुबह-शाम इसको खा लें। यह पथरी को तोड़ देता है और पथरी को पेशाब के साथ बाहर निकाल देता है।
63. कालाजार: सुबह के समय खाली पेट मूली के साथ सेंधानमक का सेवन करने से प्लीहा रोग दूर हो जाता है।
64. मासिक-धर्म का कष्ट के साथ आना (कष्टार्तव): मूली के बीजों को 5 ग्राम की मात्रा में पीसकर सुबह, दोपहर और शाम गर्म पानी के साथ सेवन करें। इससे ऋतुस्राव (मासिक-धर्म) में कष्ट की परेशानी नष्ट हो जाती है।
65. कष्टप्रद-रुका हुआ मासिकस्राव: जब मासिक-धर्म खुलकर न आए तब ऐसी दशा में तो मूली, सोया, मेथी और गाजर के बीजों को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 4-4 ग्राम की मात्रा में खाकर ऊपर से ताजा पानी पीने से बंद मासिक-धर्म खुलकर आता है। मासिक-धर्म की कमी के कारण यदि मुंहासे निकलते हो तो सुबह के समय पत्तों सहित एक मूली रोजाना खाएं।
66. बहरापन: मूली का रस निकालकर उसमें उस रस की मात्रा का चौथाई हिस्सा तिल का तेल मिलाकर आग पर पकाने के लिए रख दें। जब पकने पर केवल तेल बाकी रह जाये तो इस तेल को आग पर से उतारकर छान लें। इस तेल को दिन में 2 बार 3 से 4 बूंदे कान में डालने से बहरापन दूर हो जाता है।
67. कमरदर्द: 100 मिलीलीटर मूली के पत्तों के रस में 100 ग्राम चीनी मिलाकर 7 दिनों तक रोगी को पिलायें। इससे कमर दर्द में आराम मिलता है।
68. गुर्दे का दर्द एवं पथरी: मूली के 100 मिलीलीटर रस में मिश्री मिलाकर खाली पेट पीने से गुर्दे के दर्द एवं पथरी में फायदा होता है।
69. अग्निमान्द्य (हाजमे की खराबी):
  • 1 चम्मच मूली के रस में सेंधानमक मिलाकर सुबह-शाम खाने के बाद पानी के साथ सेवन करने से जठराग्नि के मंदे होने के कारण खट्टी डकारे समाप्त हो जाती हैं।
  • मूली खाने से अग्निमान्द्यता (भोजन का न पचना) दूर होती है।
70. जिगर के रोग:
  • 20-20 मिलीलीटर मूली और मकोय का रस एक साथ मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें। इससे यकृत (जिगर) वृद्धि रुकती है। ध्यान रहे इस मिश्रण को 10-12 वर्ष के बच्चों को आधी मात्रा में देना चाहिए।
  • 10-10 ग्राम छोटी मूली और कुलचा दोनों को लेकर पीस लें और इसे यकृत (जिगर) पर ऊपर से लेप करें। इससे यकृत वृद्धि (जिगर का बढ़ना) मिट जाती है।
71. श्वेतप्रदर: 10 मिलीलीटर मूली के कोमल ताजे पत्तों का रस रोजाना पीने से श्वेतप्रदर मिट जाता है।
72. जलोदर:
  • मूली के पत्तों का रस पिलाने से जलोदर (पेट में पानी का भरना) समाप्त हो जाता है।
  • कच्ची मूली या मूली की सब्जी खाने से पेट की सूजन समाप्त हो जाती है।
  • 60 मिलीलीटर मूली का रस सुबह के समय लेने से जलोदर (पेट में पानी का भरना) के रोग में लाभ मिलता है।
73. पित्त की पथरी: पित्त की पथरी के रोगी को सुबह-शाम 20 से 40 मिलीलीटर मूली के पत्तों का रस देने से लाभ मिलता है।
74. हॉजकिन: लासिका की ग्रंथियों को ठीक करने के लिए 1 कप मूली के पत्तों का रस चीनी मिलाकर सेवन करने से रोगी को लासिका ग्रंथियों के रोग में आराम मिलता है।
75. पेट के कीड़े: मूली के पत्तों को पीसकर प्राप्त होने वाले रस को नमक के साथ लगभग 8 दिनों तक पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। www.allayurvedic.org
76. नकसीर: अगर रोगी की नाक से ज्यादा खून बह रहा हो तो 30 ग्राम कच्ची मूली के रस में मिश्री मिलाकर रोगी को पिलाने से आराम आता है।
77. चेहरे की झांई: ताजी मूली के टुकडे़ पीसकर निचोड़ लें और एक कपड़े में छानकर रस निकाल लें। इस रस में बराबर मात्रा में मक्खन मिला लें। अब लोशन (लेप) तैयार है। नहाने से पहले रोजाना चेहरे पर इस लोशन का लेप कीजिए। इससे जल्दी ही त्वचा में निखार आ जाता है।
78. उच्चरक्तचाप:
  • मूली का नियमित सेवन करने से उच्च रक्तचाप में लाभ पहुंचता है।
  • उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) से पीड़ित स्त्री-पुरूष को मूली के सलाद व रस का रोजाना सेवन करना चाहिए। इस रोग में मूली के कोमल पत्ते चबाकर खाने से भी बहुत लाभ होता है।
79. त्वचा के रोग: मूली के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से त्वचा के सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
80. हाथ-पैरों की ऐंठन: मूली के पत्तों का रस निकालकर मालिश करने से हाथ-पैरों की ऐंठन में लाभ मिलता है।
81. सिर का दर्द:
  • मूली और सिरस के बीजों के रस को सिर दर्द के रोगी को सुंघाने से सिर के दर्द के साथ ही साथ आधासीसी (आधे सिर का दर्द) का दर्द भी खत्म हो जाता है।
  • मूली के टुकड़ों को बारीक पीसकर दिन में कई बार सुंघाने से सिर के कीड़ों की वजह से होने वाला सिर का दर्द ठीक हो जाता है।
82. रक्तस्राव (खून बहना): मूली के बीजों का चूर्ण सेवन करने से मासिक-धर्म में खून का अधिक बहना बंद हो जाता है।
83. सफेद दाग:
  • 10 ग्राम मूली के बीजों को 20 ग्राम खट्टे दही में डालकर रख दें। 4 घंटे के बाद बीजों को पीसकर लेप करें। इससे श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) के व्रण (जख्म) समाप्त हो जाते हैं।
  • मूली के बीज, पीली सरसों के दाने, दारूहल्दी, चकबड़ के बीज, गोंद, त्रिकुटा, बायबिडंग तथा कूट को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर गाय के पेशाब में मिला लें। फिर इसे 2 महीने तक दिन में 3-4 बार लेप करने से सफेद दागों में बहुत लाभ मिलता है।
84. गले के रोग150 मिलीलीटर मूली के रस में 5 ग्राम नमक मिलाकर गर्म करके गरारे करने से गले के रोगों में आराम मिलता है।
85. कण्ठमाला:
  • 5-5 ग्राम मूली का रस, शंख भस्म (शंख की राख) और हल्दी को पीसकर पानी में मिलाकर लेप करने से गिल्टी (गांठ), अपच (भोजन न पचना), ग्रंथि और फुंसियां ठीक हो जाती हैं।
  • मूली के बीजों को पीसकर बकरी के दूध में मिलाकर गले की गांठों पर लेप करने से लाभ मिलता है।
86. गले का दर्द: मूली का रस और पानी को बराबर मात्रा में लेकर उसमें नमक मिलाकर गरारे करने से गले का दर्द ठीक हो जाता है।
87. गले की सूजन: थोड़े से मूली के बीजों को पीसकर गर्म पानी से सेवन करने से गले की सूजन में लाभ मिलता है।
88. गले में घाव: गले में घाव (जख्म) होने पर मूली के रस में पानी मिलाकर गरारे करने से आराम आता है।
89. स्वरभंग (गला बैठना):
  • आधा चम्मच मूली के बीजों को पीसकर गर्म पानी के साथ लेने से गला साफ हो जाता है।
  • मूली के बीजों को पीसकर गर्म पानी में मिला लें। उसके बाद किसी साफ कपड़े में छानकर रोगी को खिलाने से बैठा हुआ गला खुल जाता है।
  • मूली के 5-10 ग्राम बीजों को पीसकर गर्म पानी के साथ दिन में 3-4 बार फंकी लेने से गला ठीक होकर आवाज साफ हो जाती है।
90. मूली के कुछ अन्य लाभ:
  • मूली शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड को निकालकर जीवनदायी ऑक्सीजन पैदा करती है।
  • मूली में विटामिन-ए पाया जाता है, जो आंखों की रोशनी को बढ़ाता है। इसके नियमित प्रयोग से चश्मे का नंबर कम हो जाता है और चश्मा उतर भी जाता है।
  • मूली के सोडियम और क्लोरीन तत्त्व मल को आसानी से निकालने में सहायक होते हैं। मूली में पाया जाने वाला मैग्नीशियम पाचन-क्रिया को नियमित करता है। गंधकीय तत्व चर्म (त्वचा) रोगों से छुटकारा दिलाते हैं।
  • मूली में काफी मात्रा में लौह-तत्व मौजूद होते हैं, जो खून को साफ करते हैं। खून साफ होने से शरीर में प्राकृतिक निखार आता है। नाखूनों में लाली आ जाती है और चेहरा गुलाबी आभा से चमकने लगता है।
  • मूली में कैल्शियम प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है, जिससे हडि्डयां और दांत मजबूत हो जाते हैं।
  • मूली शरीर की शुष्कता (सूखापन) को दूर करती है। जठराग्नि (भूख को बढ़ाती) प्रदीप्त करती है और पेट की गर्मी को दूर करती है। मूली के सेवन से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।
  • चेहरे के मुंहासे, कील, झांईयां और दाग कम करने में मूली का बड़ा सहयोग रहता है।
  • मूली मासिक-धर्म और वीर्य पुष्ट करती है। श्वेतप्रदर के रोग को दूर करने में भी यह बहुत सहायक है।
  • मूली खांसी और दमे में लाभदायक है, लेकिन इसको खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए।
  • मूली के 5 ग्राम बीज मक्खन के साथ सुबह के समय 1 महीने तक नियमित रूप से लेंने से पौरुष परिपुष्ट (मर्दानगी) होती हैं।
  • जोड़ों में दर्द हो या कंधे और घुटने में दर्द हो तो मूली का सेवन करने से जकड़न भी खुल जाती है।
  • शरीर के किसी ऊपरी भाग मे सूजन आ गई हो तो मूली का रस गर्म करके लगाने से लाभ होता है।
  • गुर्दे की बीमारी में मूली लाभदायक हैं। मूली के सेवन से पेशाब सम्बंधी बीमारियां, जैसे रूक-रूककर पेशाब आना, उसमें जलन होना आदि रोग दूर होते हैं।
  • मूली के रस से सिर को धोने से लीखें और जुएं समाप्त हो जाती हैं।
  • डायबिटीज के रोगियों के लिए मूली काफी लाभकारी है।
  • कान की सुनने की शक्ति कमजोर हो गई हो, तो मूली के रस में नींबू का रस मिला लें और उसे गुनगुना करके कान में डालें और उल्टा लेट जाएं, ताकि कान की सिंकाई के बाद रस बाहर निकल जाए। इससे कान का मैल बाहर आ जाएगा और साफ सुनाई देने लगेगा।
  • कान में दर्द हो तो मूली के पत्ते सरसों के तेल में उबाल लें। इस रस की 2-2 बूंदे कान में टपकाने से दर्द अवश्य शांत होगा।
  • मूली को उबालकर खाने से गर्भ मे स्थिरता आती है और गर्भपात नहीं होता है।
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